
नियमों की धज्जियाँ: मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद ‘ऑनलाइन’ के बजाय ‘ऑफलाइन’ तबादलों का गोरखधंधा।
'मंत्रीजी' का विवादित बयान: सवाल पूछने पर पत्रकार को 'खर्चा-पानी' लेने की पेशकश। भ्रष्टाचार को संरक्षण: दागी बाबू नपे, लेकिन 'भ्रष्टाचार के मुखिया' (जिला कृषि अधिकारी) को अभयदान क्यों? दस साल से 'घोटालों की खेती': क्या कृषि विभाग अब मात्र 'लिफाफा संस्कृति' का अड्डा है?
अजीत मिश्रा (खोजी)
कृषि विभाग में ‘बदली’ की आड़ में ‘नोटों की खेती’: क्या ‘मंत्रीजी’ के संरक्षण में फल-फूल रहा है भ्रष्टाचार?
- कृषि विभाग में तबादलों का ‘अवैध खेल’: क्या ‘ऑफलाइन’ घपले से भरे गए बाबूओं के लिफाफे?
- तबादले या भ्रष्टाचार का बाजार? नियम ताक पर रखकर हुआ ‘ऑफलाइन’ लेनदेन!
- ‘मंत्रीजी’ ने पत्रकार को दिया ‘खर्चा-पानी’ का ऑफर, विभाग में मची खलबली!
- भ्रष्ट बाबू नपे, पर ‘भ्रष्टाचार के मुखिया’ को अभयदान क्यों? क्या ‘मंत्रीजी’ के संरक्षण में पनप रहा है घोटाला?
- दस साल से कृषि विभाग में ‘घोटालों की खेती’: आखिर कब तक जारी रहेगा यह ‘सिस्टम’?
बस्ती: क्या उत्तर प्रदेश सरकार का कृषि विभाग ‘भ्रष्टाचार का अड्डा’ बन चुका है? यह सवाल किसी और ने नहीं, बल्कि विभाग में हाल ही में हुए विवादास्पद तबादलों ने खड़े किए हैं। उजागर हुआ यह मामला सीधे तौर पर जिले के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही की कार्यप्रणाली और विभाग की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
नियमों की धज्जियाँ, ‘ऑफलाइन’ खेल का सच
शासन का स्पष्ट आदेश था कि तबादले पूरी तरह से ऑनलाइन और ई-ऑफिस के माध्यम से होने चाहिए। लेकिन ‘सेटिंग’ के मास्टरमाइंडों ने मुख्यमंत्री के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। 31 मई की समय-सीमा पार होने के बाद, मनमाने ढंग से ‘ऑफलाइन’ तबादले किए गए, जिसका एकमात्र मकसद धन उगाही था। डिजिटल सिग्नेचर न होना इस बात का प्रमाण है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से अवैध थी।
’मंत्रीजी’ का ‘खर्चा-पानी’ वाला बयान
सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया जब इन तबादलों पर सवाल उठाने वाले पत्रकार को खुद कृषि मंत्री ने ‘खर्चा-पानी’ लेने की पेशकश कर डाली। क्या एक जिम्मेदार मंत्री से इस तरह के बयान की अपेक्षा की जा सकती है? यह घटना स्पष्ट करती है कि जब मंत्री खुद सवालों से घबराकर अनैतिक पेशकश करने लगें, तो विभाग की ईमानदारी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सवाल बड़ा है: ‘भ्रष्टाचार के मुखिया’ को क्यों बचाया?
विभाग में तबादले नीति के तहत केवल 10 फीसदी तबादले होने थे, लेकिन 100 फीसदी तबादले कर दिए गए। बाबूओं पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, इसलिए उन्हें तो हटा दिया गया, लेकिन ‘भ्रष्टाचार के मुखिया’ कहे जाने वाले जिला कृषि अधिकारी को अभयदान क्यों दिया गया? क्या इसलिए कि वे ‘मोटा लिफाफा’ पहुँचाने में माहिर हैं?
दस साल का ‘भ्रष्ट’ रिकॉर्ड
खाद घोटाले से लेकर मृदा परीक्षण और मेड़बंदी घोटालों तक, यह विभाग घोटालों की खान बन चुका है। सवाल यह है कि पिछले दस वर्षों से एक ही व्यक्ति को बार-बार कृषि मंत्री क्यों बनाया जा रहा है? क्या यह विभाग की विफलता का प्रतीक नहीं है?
जनता अब जवाब चाहती है। क्या ‘मंत्रीजी’ इस ‘ऑफलाइन खेल’ की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर यह भ्रष्टाचार का सिलसिला इसी तरह ‘लिफाफा संस्कृति’ के साथ चलता रहेगा?




















