
दसिया में गरमाई सियासत: सांसद-विधायक को रोका तो भड़के जनप्रतिनिधि, पुलिस के साथ हुई नोकझोंक
दसिया का 'एथेनॉल संकट': विकास की भेंट चढ़ती सहमति और प्रशासन-जनता के बीच बढ़ती खाई; बस्ती में विकास के नाम पर 'अशांति': दसिया एथेनॉल प्लांट को लेकर प्रशासनिक सख्ती पर उठे सवाल; जब जनता के बीच पहुंचने से रोके गए जनप्रतिनिधि: दसिया विवाद में गहराया अविश्वास का संकट
अजीत मिश्रा (खोजी)
दसिया एथेनॉल प्लांट विवाद: छावनी में तब्दील हुआ इलाका, जनप्रतिनिधियों को रोका तो गरमाई सियासत
- दसिया का ‘एथेनॉल संकट’: विकास की भेंट चढ़ती सहमति और प्रशासन-जनता के बीच बढ़ती खाई
- बस्ती में विकास के नाम पर ‘अशांति’: दसिया एथेनॉल प्लांट को लेकर प्रशासनिक सख्ती पर उठे सवाल
- जब जनता के बीच पहुंचने से रोके गए जनप्रतिनिधि: दसिया विवाद में गहराया अविश्वास का संकट
बस्ती: जिले के दसिया गांव में स्थापित हो रहे एथेनॉल प्लांट को लेकर स्थानीय निवासियों का विरोध और प्रशासन की सख्ती के बीच माहौल काफी तनावपूर्ण बना हुआ है। 14 जुलाई 2026 को प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यहां पहले से ही BNSS की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144 CrPC) लागू है।जिले के दसिया गांव में एथेनॉल प्लांट को लेकर उपजा वर्तमान गतिरोध मात्र एक औद्योगिक परियोजना का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस गहरे संकट को दर्शाता है जो विकास की अंधी दौड़ और स्थानीय हितों के टकराव से उत्पन्न होता है। जब भी विकास की कोई परियोजना जनता की सहमति और उनके सरोकारों को दरकिनार कर थोपी जाती है, तो वहां विरोध के स्वर मुखर होना स्वाभाविक है।
पुलिस की सख्त घेराबंदी, जनप्रतिनिधियों को किया गया बाधित
प्रस्तावित प्रदर्शन के मद्देनजर पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद दिखा। गौरा चौराहे से ही भारी पुलिस बल की तैनाती कर दी गई थी। इस दौरान बस्ती के सांसद और स्थानीय विधायक राजेंद्र प्रसाद चौधरी जब स्थानीय नागरिकों की समस्याएं सुनने के लिए दसिया गांव की ओर बढ़े, तो पुलिस ने जगह-जगह बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोक दिया। भारी विरोध और गतिरोध के बाद जनप्रतिनिधियों ने मौके पर मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा और वापस लौट गए। प्रशासन द्वारा 14 जुलाई को प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए धारा 163 (BNSS) का सहारा लेना और जनप्रतिनिधियों को बैरिकेडिंग कर रोकना, यह स्पष्ट करता है कि सरकार और जनता के बीच संवाद की खाई कितनी चौड़ी हो चुकी है। प्रशासन का ‘छावनी’ में तब्दील होना सुरक्षा का उपाय तो हो सकता है, लेकिन यह समाधान नहीं है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का प्राथमिक दायित्व है, परंतु लोकशाही में पुलिसिया सख्ती से ज्यादा आवश्यक ‘लोक-संवाद’ है।
”जनहित से समझौता नहीं”: राम प्रसाद चौधरी
इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए राम प्रसाद चौधरी ने कहा, “औद्योगिकीकरण और विकास के नाम पर भोली-भाली जनता का शोषण और उनके हितों की अनदेखी कतई स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने पुलिस द्वारा जनप्रतिनिधियों को रोके जाने को “अत्यंत निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया। सांसद और विधायक जैसे जनप्रतिनिधियों का धरना स्थल पर पहुंचने का प्रयास और उन्हें रोका जाना एक चिंताजनक राजनीतिक संकेत है। जब निर्वाचित प्रतिनिधि जनता की समस्याओं को सुनने के लिए लालायित हों और प्रशासन उन्हें अवरुद्ध करे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता को ही इंगित नहीं करता, बल्कि यह उन संदेहों को भी पुख्ता करता है जो स्थानीय जनता के मन में एथेनॉल प्लांट के पर्यावरण, स्वास्थ्य और भूमि अधिग्रहण को लेकर व्याप्त हैं। राम प्रसाद चौधरी का यह कथन कि “विकास के नाम पर जनता का शोषण स्वीकार्य नहीं है,” एक चेतावनी है जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए।
सांसद व विधायक ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि:
- किसी भी प्रोजेक्ट के नाम पर स्थानीय पर्यावरण, किसानों की सहमति और जनता के स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जाएगा।
- प्रशासन अपना तानाशाही रवैया छोड़कर इस विवाद का तत्काल न्यायसंगत समाधान निकाले।
- जनप्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया है कि वे दसिया के प्रत्येक परिवार के साथ मजबूती से खड़े हैं और यह लड़ाई जारी रहेगी।
यह स्पष्ट है कि एथेनॉल उत्पादन देश की ऊर्जा नीति और कृषि-अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन ‘देश का विकास’ तब तक अधूरा है जब तक कि वह ‘स्थानीय जन का विनाश’ न करे। यदि एक फैक्ट्री के आने से क्षेत्र के किसानों की सहमति और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो ऐसी विकास योजना पर पुनर्विचार अनिवार्य है।
प्रशासन की दो टूक: कानून का उल्लंघन करने पर होगी सख्त कार्रवाई
वहीं, जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा व्यवस्था में कोई चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन ने चेतावनी जारी की है कि यदि किसी ने भी शांति व्यवस्था भंग करने, सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने अथवा निषेधाज्ञा (धारा 163) का उल्लंघन किया, तो उनके खिलाफ कठोर विधिक कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन की चेतावनी कि कानून तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी, महज एक औपचारिकता है। असल चुनौती यह है कि शासन-प्रशासन कैसे विश्वास बहाली की प्रक्रिया शुरू करता है। क्या प्रशासन तानाशाही रवैये को त्यागकर कोई ‘मध्यम मार्ग’ निकाल पाएगा? क्या एथेनॉल प्लांट और ग्रामीणों के हितों के बीच एक ऐसा संतुलन बन पाएगा जहां फैक्ट्री भी चले और स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य-पर्यावरण भी सुरक्षित रहे?
- प्रशासनिक सख्ती और निषेधाज्ञा: 14 जुलाई 2026 को प्रस्तावित प्रदर्शन के मद्देनजर जिला प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरे क्षेत्र में BNSS की धारा 163 (पूर्ववर्ती 144 CrPC) लागू है।
- सुरक्षा का अभेद्य घेरा: प्रशासन ने गौरा चौराहे से लेकर दसिया तक भारी पुलिस बल तैनात किया है, जिससे पूरा इलाका पुलिस छावनी में बदल गया है। किसी भी स्थिति में प्रदर्शनकारियों को प्लांट तक पहुंचने से रोकने के निर्देश हैं।
- जनप्रतिनिधियों से गतिरोध: स्थानीय सांसद और विधायक राजेंद्र प्रसाद चौधरी जब किसानों की समस्याएं सुनने मौके पर पहुंचे, तो उन्हें प्रशासन द्वारा बैरिकेडिंग कर रोक दिया गया। बाद में उन्होंने वहीं वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा।
- विरोध के मुख्य कारण: स्थानीय निवासियों और जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि विकास के नाम पर किसानों की सहमति, पर्यावरणीय सुरक्षा और जनता के स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
- प्रशासन की चेतावनी: प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि कानून-व्यवस्था भंग करने, सरकारी-निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर विधिक कार्रवाई की जाएगी।
- जनप्रतिनिधियों का रुख: स्थानीय नेतृत्व ने प्रशासन के रवैये को ‘तानाशाही’ करार दिया है और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। जनप्रतिनिधियों ने घोषित किया है कि वे दसिया के प्रत्येक परिवार के साथ मजबूती से खड़े हैं और यह लड़ाई न्याय मिलने तक जारी रहेगी।
- संवाद का अभाव: वर्तमान स्थिति स्पष्ट रूप से प्रशासन और प्रभावित जनता के बीच बढ़ते अविश्वास और संवाद की कमी को दर्शाती है।
अब समय आ गया है कि बस्ती प्रशासन दमनात्मक रुख छोड़कर पारदर्शिता अपनाए। जनता के बीच जाकर उनकी शंकाओं का तार्किक निराकरण करना ही एकमात्र मार्ग है। अन्यथा, ‘विकास’ के नाम पर उपजा यह असंतोष न केवल क्षेत्र की शांति को प्रभावित करेगा, बल्कि लोकतंत्र के उस बुनियादी सिद्धांत को भी कमजोर करेगा, जिसमें अंतिम निर्णय ‘जनता की सहमति’ से होता है।
फिलहाल, दसिया गांव में स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है। एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर उपजा यह विवाद अब स्थानीय सियासत के केंद्र में आ गया है, जिससे प्रशासन और जन प्रतिनिधियों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।















