
नागपुर मे 135 वर्ष पुरानी परंपरा एवं त्योहार “मारबत” आज मनाया जा रहा है। आइये जानते है मारबत की परंपरा के बारे मे -:मारबत काले और पीले रंग को पीले रंग के पुतले को पिवली और काले रंग के पुतले काली मारबत कहा जाता है। इन पुतलो को इतवारी एवं नागपुर के गलियों से जुलुस निकालकर दूर ले जाया जाता है। फिर इनको शहर से बाहर ले जाकर जला दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन पुतलों के जला देने से नकरात्मक शक्ति का नाश हो जाता है। जुलुस के साथ साथ एक मंत्र भी गाया जाता है-:ईडा, पीड़ा, घेऊं, जा गे मारबत” अर्थात सामाजिक बुराइयो और मानवीय दुखो को दूर करो । मान्यता है कि काली मारबत भोंसला रानी बांकाबाई का प्रतीक है जो कि ब्रिटिश सत्ता के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। यह लोगो द्वारा उनके कृत्य के प्रति अपना नाराजगी दिखाने का तरीका था। माना जाता है कि पीली मारबत ब्रिटिश शासन के साथ साथ महामारी और बीमारी का प्रतीक भी है। हर वर्ष ऐसे शुभंकर भी होते है जो समाज द्वारा सामना की जाने वाली विशिष्ट बुराइयो को दर्शाते है। हर वर्ष नये विषय होते है। पीली मारबत तरहाने तेली समुदाय द्वारा बनाई जाती है। काली मारबत नेहरे पुतला चौक के पास वाले दुकानदारो द्वारा बनाई जाथी है। मारबत को आग के हवाले कर दिया जाता है । यह उस क्रिया का समापन होता है जो कि मई के महिने मे शूरू होती है मारबत केवल बांस और कागज से बनाई जाती है। 1880 के दशक मे अंग्रेजो के विरूद्ध विरोध जताने के लिए गुड़ियो के रूप मे शूरू हुआ यह परंपरा अब नागपुर का विशेष सामाजिक त्योहार के रूप मे मनाया जाने लगा है।






