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भाई-बहन के स्नेह व अटूट रिश्ते को समर्पित है भाईदूज

सागर,वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी*822507266* हमारा भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न त्योहार मनाये जाते हैं, जो केवल परम्परा नहीं है, बल्कि वे जीवन की शैली है। यहाँ प्रत्येक पर्व एक विशेष संबंध, भावना एवं संस्कृति को दर्शाता है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है “भाई दूज” जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को समर्पित है। यह पर्व दीवाली के दो दिन बाद, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। भाई दूज का दिना भाई-बहन के रिश्ते की स्नेहिल मिठास को और भी मजबूत बनाने का अवसर है। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सफलता की कामना करती हैं और भाई आपनी बहनों का रक्षा का वचन देते हैं। यह परम्परा आपसी विश्वास और प्रेम का प्रतीक है। भाई-दूज से जुड़ी कई पौराणिक कथायें प्रसिद्ध हैं, जिनमें से एक प्रमुख कथा यमराज और यमुना जी की है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया की दो संतानें थीं पुत्र यमराज और पुत्री यमुना । यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और उन्हें अपने घर आकर भोजन करने के लिये कहती रहती थी। यमराज अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात टालते रहते थे। कई बर्षों बाद अचानक कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को, यमराज यमुना के घर पहुँच गये। यमुना अपने भाई यमराज को देखकर बहुत प्रसन्न हुई, उनका विधिवत स्वागत किया, उन्हें भोजन कराया और उनका तिलक किया। यमुना के प्रेम और आतिथ्य से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कोई वरदान माँगने के लिये कहते हैं। अतः यमुना वरदान माँगती है कि यमराज प्रत्येक वर्ष इसी दिन उनके घर आकर भोजन करें और जो बहन अपने भाई को तिलक करें, उसे यम का भय न हो। यमराज “तथास्तु” कहकर यमुना के वरदान को स्वीकार करके उन्हें भेंट देकर यमलोक चले गये। इस घटना के पश्चात ही भाई दूज के पर्व को मनाने की परम्परा आरंभ हुई, जिसमें बहन अपने भाई का तिलक करती है और उसके मंगलमय व लम्बी आयु की कामना करती है। तभी से यह दिन यम‌द्वितीया के नाम से भी जाना जाने लगा है। दूसरी कथा के अनुसार भाई दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध करके द्वारका लौटने पर, अपनी बहन सुभद्रा से भेंट की सुभद्रा ने उनके स्वागत के लिये दीप जलाए, मिठाईयों और पुष्प अर्पित किये, भगवान श्रीकृष्ण के माथे पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु की कामना की। तभी से यह दिन भाई और बहन के स्नेह और सुरक्षा के प्रतीक पर्व के रूप में मनाया जाने लगा । भाई दूज केवल एक धार्मिक या पारम्परिक त्योहार नहीं है, बल्कि आज के आधुनिक समाज में भी यह सम्बन्धों को मजबूत करने का अवसर है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि परिवार और रिश्तों की अहमियत, समय और दूरी से कहीं अधिक है । तकनीक के इस आधुनिक युग में भी भावनायें वही है, बस उन्हें व्यक्त करने के तरीके बदल गये है। समय के साथ जैसे जैसे समाज और जीवन शैली में बदलाव आया है, वैसे वैसे इस पर्व के स्वरूप एवं मनाने के तरीकों में भी कई बदलाब आये हैं। आधुनिक युग में भाई दूज के बदलते रूप आधुनिक युग तकनीकी प्रगति व्यस्त जीवन शैली और वैश्विक जुड़ाव का युग है। ऐसे समय भाई दूज केवल एक धार्मिक परम्परा न रहकर, एक भावनात्म्क सम्बन्ध और सांस्कृतिक विरसत को निभाने का माध्यम बन गया है। आज यह त्योहार सिर्फ रश्मों तक सीमित नहीं है, यह भावनाओं की अभिव्यक्ति का भी जरिया बन चुका है। आज के समय में जब भाई-बहन अलग अलग शहरों या देशों में रहते हैं, तब वीडियोकॉल, वर्चुअल तिलक और ऑललाइन गिफ्ट के माध्यम से भाई दूज पर्व मनाया जाता है। डिजिटल कनेक्शन ने दूरी को कम कर दिया है। ऑनलाइन गिफ्टिंग और शॉपिंग का ट्रेंड बन गया है, अब बहन या भाई ऑनलाइन गिफ्ट मॅगवाकर एक दूसरे को भेजते है। कई वेबसाईट पर भाई दूज के लिये विशेष उपहार पैकेज भी उपलब्ध हैं वर्किंग महिलायें को टाईम मैनेजमेंट का ध्यान रखना पड़ता है। पहले बहनें पूरे दिन अपने भाई के स्वागत की तैयारी करती थीं, लेकिन अब अधिकांश महिलायें कार्यरत हैं, इसलिये भाई दूज को संक्षिप्त और सरल तरीकें से मनाया जाता है -लेकिन प्रेम और स्नेह वही कायम रहता है। समानता और आदान प्रदान की भावना बढ़ रही है। आधुनिक युग में केवल बहनें ही नहीं, भाई भी बहनों को तिलक करते हैं, उपहार देते हैं और उनके जीवन की सफलता की कामना करतें हैं। यह त्योहार अब दोनों के समान प्रेम और सम्मान का प्रतीक बन गया है। ईकोफ्रेंडली और सरल उत्सव को अपनाया जा रहा है। लोग अब अधिक सजावट और दिखावा की बजाय, साधारण, पर्यावरण के अनुकूल एवं भावनात्मक रूप से समृद्ध तरीके से त्योहार मनाते हैं। आधुनिक शिक्षा और माडर्न सोच ने भाई बहन के रिश्ते को मजबूत किया है, रिश्तों में पारदर्शिता व समझ बढ़ गई है। अब भाई दूज एक ऐसा दिन बन चुका है जब दोनों अपने जीवन के अनुभव साझा करते हैं। अब बहनें आत्मनिर्भर हो गई हैं । भाई बहन का रिश्ता अब केवल रक्षा का नहीं, बल्कि एक दूसरे के सहारे और प्रेरणा का पर्व बन गया है आज के माडर्न युग में, भले ही भाई दूज को मनाने के तरीके बदल गये हैं, लेकिन इस त्योहार का मूल भाव प्रेम, सुरक्षा, आशीर्वाद और साथ का संकल्प आज भी उतना ही सशक्त है। भाई दूज एक ऐसा पर्व है जो हमें याद दिलाता है कि चाहे हम कितने भी व्यस्त हों, रिश्ते की मिठास और अपनापन कभी भी कम नहीं होने देंगे एवं भाई बहन के संबंध को और अधिक गहरा बनायेगें यह पर्व भारतीय संस्कृति में भाई बहिन के प्रेम को जीवन्त बनाए रखने का कार्य करता है। यह दिन रिश्तों की मधुरता बढ़ाता है और हमें यह दिखाता है कि स्नेह, विश्वास और सहयोग ही प्रत्येक रिश्ते की नींव होती है। आज हम सब अपने भाई बहनों के साथ अपने प्रेम को और मजबूत करें और इस परम्परा को अगली पीढ़ी तक गर्व से पहुँचायें

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