
।। आईएएस अनुराग जैन की अयोध्या विकास प्राधिकरण में नई पारी, पुरानी चुनौतियों की जकड़।।
उत्तर प्रदेश
अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) के नए उपाध्यक्ष के रूप में आईएएस अनुराग जैन की तैनाती एक ताज़ा उम्मीद की तरह दिखती है — लेकिन इस उम्मीद की राह में भ्रष्टाचार, लापरवाही और फाइलों के जंगल की दीवारें मोटी हैं। महराजगंज और अंबेडकरनगर जैसे जिलों में विकास योजनाओं के लिए सख्त रवैये के लिए जाने जाने वाले अनुराग जैन अब उस कुर्सी पर बैठे हैं, जिसकी जड़ में ही “कमीशन संस्कृति” गहराई तक पैठ चुकी है।
अयोध्या विकास प्राधिकरण के दफ्तर का हाल किसी खुले भ्रष्टाचार बाजार से कम नहीं। मानचित्र स्वीकृति से लेकर भूमि उपयोग परिवर्तन तक, हर प्रक्रिया में दलालों की जड़ें गहरी हैं। फाइलें जिन रफ्तार से चलनी चाहिएं, उसी रफ्तार से जेबें पहले गर्म होती हैं। शहर के विस्तार की योजनाएँ अक्सर “चयनित बिल्डरों” के हित में मोड़ दी जाती हैं, जबकि आम नागरिक का नक्शा महीनों टेबल पर धूल खाता रहता है।
नए उपाध्यक्ष के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं — ऑफिस के भीतर की मिलीभगत और फील्ड में अव्यवस्था। फील्ड में निरीक्षण दल अक्सर केवल फोटो खिंचवाने के लिए निकलते हैं, ज़मीन पर नियमों का पालन शायद ही होता हो। अवैध निर्माणों पर नोटिस की फाइलें लंबी हैं, पर कार्रवाई लगभग शून्य। ये सब उस तंत्र का हिस्सा बन चुका है, जो खुद को विकास प्राधिकरण” कहता है, लेकिन विकास से ज़्यादा “प्रभावशाली प्राधिकरण” बन चुका है।
अयोध्या अब राष्ट्रीय पहचान का शहर है — राम मंदिर, परिक्रमा पथ, स्मार्ट सिटी और टूरिज़्म कॉरिडोर के नाम पर अरबों रुपये बह रहे हैं। इस समय शहर को एक सख्त, ईमानदार और ज़मीनी अफसर की ज़रूरत है, जो सिर्फ बयान नहीं दे, बल्कि “ADA” की खोखली दीवारों में नई ईंट गढ़े।
अगर अनुराग जैन सिस्टम को हिला पाते हैं, तो वे सिर्फ एक अफसर नहीं, बल्कि उस बदलाव के प्रतीक बन सकते हैं जिसकी अयोध्या को सख्त ज़रूरत है।लेकिन अगर वे भी उन्हीं चंद लोगों के प्रभाव में आ गए, तो विकास की इस पवित्र नगरी में “प्राधिकरण” फिर “प्रायोजित भ्रष्टाचार” का पर्याय बन जाएगा।








