
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। इंजीनियरिंग का ‘अजूबा’ या जनता के साथ भद्दा मजाक? सिडको ने सड़क के बीचों-बीच खड़ी कर दी नाली की दीवार।।
शुक्रवार 23 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती।। जिले के दुबौलिया ब्लॉक अंतर्गत तिघरा ग्राम पंचायत में विकास के नाम पर एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसे देखकर लोग दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हैं। कार्यदायी संस्था सिडको (SIDCO) ने क्षेत्र में ‘अनोखी इंजीनियरिंग’ का प्रदर्शन करते हुए आवागमन के मुख्य मार्ग के बीचों-बीच नाली का निर्माण कर दिया है। हद तो तब हो गई जब यह नाली सड़क की सतह से करीब एक फीट ऊंची बना दी गई, जिसने रास्ते को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया है।

💫सांसद निधि के लाखों रुपये ‘गड्ढे’ में?
मिली जानकारी के अनुसार, सांसद निधि से लगभग 5 लाख रुपये की लागत से दो मार्गों पर नाली का निर्माण कराया गया है। एक नाली इंटर कॉलेज के बगल वाले खड़ंजा मार्ग पर 85 मीटर लंबी है, तो दूसरी अमृत सरोवर और रविदास मंदिर को जोड़ने वाले मार्ग पर लगभग 115 मीटर लंबी। बिना किसी तकनीकी सूझ-बूझ के, सड़क के सीने को चीरकर बनाई गई यह एक फीट ऊंची नाली अब ग्रामीणों के लिए विकास नहीं, बल्कि जी का जंजाल बन गई है।
💫आवागमन ठप, हादसे को दावत
सड़क के बीचों-बीच बनी इस ऊंची दीवार नुमा नाली के कारण अब न तो साइकिल निकल पा रही है और न ही पैदल चलना सुरक्षित रह गया है। ग्रामीणों का कहना है कि रात के अंधेरे में यह नाली किसी जानलेवा जाल से कम नहीं है।
शिकायत की अनदेखी: ग्राम प्रधान रामचंद्र ने बताया कि निर्माण के दौरान ही उच्चाधिकारियों को इस अव्यवस्था से अवगत कराया गया था, लेकिन सत्ता और विभाग की नींद नहीं टूटी।
दलीलें भी अजीब: विभाग के अवर अभियंता का कहना है कि नाली के दोनों तरफ मिट्टी डालकर उसे बराबर किया जाएगा। सवाल यह उठता है कि क्या मिट्टी डालने से सड़क की चौड़ाई और उसकी उपयोगिता पहले जैसी रह पाएगी?
💫भ्रष्टाचार और लापरवाही की गंध
सड़क के बीच में नाली बनाने का निर्णय किसका था? क्या निर्माण से पहले कोई सर्वे नहीं किया गया? 5 लाख रुपये की सार्वजनिक राशि को इस तरह बर्बाद करना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का संकेत है। ग्रामीण अब इस निर्माण की उच्चस्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
यदि विकास का पैमाना यही है कि मुख्य रास्तों को ही बंद कर दिया जाए, तो विभाग को अपनी कार्यशैली पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। तिघरा गांव के लोग आज खुद से पूछ रहे हैं— “ये विकास हो रहा है या हमें हमारे ही घरों में कैद किया जा रहा है?”








