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अमृत अस्पताल या ‘मौत का सेंटर’? पंजीकरण खत्म, फिर भी जारी था इलाज का खेल

स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी: बिना रजिस्ट्रेशन चल रही 'मौत की दुकान' में गई महिला की जान

अजीत मिश्रा (खोजी)

संपादकीय: स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर ‘मौत का सौदागरी’ कब तक?

  • मुंडेरवा: क्या ‘अमृत’ नाम के अस्पताल में मिलता है सिर्फ जहर? इलाज के नाम पर हो रहा था खिलवाड़
  • बस्ती स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही: मौत के बाद जागी प्रशासन की नींद, अस्पताल पर भारी जुर्माने की तैयारी
  • 30 अप्रैल को खत्म हुआ रजिस्ट्रेशन, फिर भी मरीजों को लूटते रहे डॉक्टर; क्या विभाग को खबर नहीं थी?
  • सिस्टम का ‘अमृत’ काल: बिना लाइसेंस चल रहे अस्पताल ने ली महिला की जान, अब कागजी कार्रवाई में जुटा विभाग

​बस्ती जिले में ‘अमृत अस्पताल’ के नाम से चल रही एक कथित स्वास्थ्य सेवा संस्था ने एक बार फिर चिकित्सा जगत को शर्मसार किया है। मुंडेरवा स्थित इस अस्पताल में इलाज के दौरान एक महिला की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। यह केवल एक मौत का मामला नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की विफलता है जो कागजों पर तो मानकों का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन जमीन पर आम आदमी की जान से खिलवाड़ कर रही है।

गंभीर सवाल जो व्यवस्था पर उठते हैं:

  • बिना पंजीकरण, किसका संरक्षण? सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस अस्पताल का पंजीकरण 30 अप्रैल को ही समाप्त हो चुका था, फिर भी यह धड़ल्ले से संचालित हो रहा था। बड़ा सवाल यह है कि स्वास्थ्य विभाग के नाक के नीचे, बिना पंजीकरण के अस्पताल आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा था? क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी, या जानकर भी अनजान बना हुआ था?
  • गलत इलाज और मनमानी: परिजनों का आरोप है कि बिना किसी जांच-पड़ताल के महिला को गलत इंजेक्शन दिए गए, जिसके कारण उसकी जान चली गई। यह चिकित्सा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘मौत की सौदेबाजी’ है।
  • दोषियों पर कार्रवाई कब? अस्पताल का संचालक डॉ. मनीष श्रीवास्तव अभी भी फरार बताया जा रहा है। सवाल यह है कि एक ऐसी घटना के बाद, जिसमें किसी की जान चली गई हो, जिम्मेदार व्यक्ति अभी भी पुलिस की पकड़ से दूर कैसे है?

जुर्माना ही एकमात्र समाधान नहीं:

​प्रशासन अब अस्पताल पर भारी जुर्माना लगाने और उसे सील करने की बात कर रहा है। लेकिन क्या जुर्माना या अस्पताल सील करना इस परिवार के घावों को भर सकता है? यह कार्रवाई तो बहुत पहले हो जानी चाहिए थी। अस्पताल संचालकों का मनमाना रवैया और स्वास्थ्य विभाग की ढिलाई यह दर्शाती है कि आम जनता की जान कितनी सस्ती हो गई है।

निष्कर्ष:

​बस्ती में यह कोई पहला मामला नहीं है। अस्पताल संचालकों में कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है। प्रशासन को केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए जुर्माना नहीं लगाना चाहिए, बल्कि इस मामले में शामिल हर उस व्यक्ति पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जिसकी लापरवाही से यह घटना घटी है। अगर जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाती है, तो उन पर भी गाज गिरनी चाहिए।

​समय आ गया है कि स्वास्थ्य के नाम पर चलने वाली इन ‘मौत की दुकानों’ को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को अपनों को खोने का दर्द न झेलना पड़े।

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