
बेलगड़ा टोल पर ‘दबंगई’ का तांडव: शुल्क बचाने के लिए कानून का चीरहरण, पुलिस की सुस्ती पर उठे सवाल
सिद्धार्थनगर में गुंडाराज: टोल कर्मियों पर हमला, जातिसूचक गाली और सरकारी संपत्ति को नुकसान; कब जागेगा प्रशासन? टोल पर दबंगों का कब्ज़ा: नियमों की धज्जियाँ उड़ाते 'बाहुबली', क्या वर्दी बेबस हो गई है?
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिद्धार्थनगर में ‘दबंगई’ का नंगा नाच: टोल प्लाजा पर कानून-व्यवस्था को चुनौती, पुलिस की सुस्ती पर उठे सवाल
- सड़क पर कानून का मजाक: बेलगड़ा टोल पर मारपीट से हड़कंप, आरोपियों पर मेहरबान क्यों है पुलिस?
- टोल कर्मियों से अभद्रता और ब्राह्मण समाज पर टिप्पणी: बेलगड़ा टोल प्लाजा बना अपराधियों का अखाड़ा
सिद्धार्थनगर: क्या जनपद में अब कानून का राज समाप्त हो गया है? बेलगड़ा टोल प्लाजा पर जो कुछ घटा है, वह न केवल निंदनीय है, बल्कि प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। चंद पैसों के टोल शुल्क को बचाने के लिए की गई दबंगई ने यह साबित कर दिया है कि कुछ लोगों के लिए कानून केवल एक कागजी पुलिंदा बनकर रह गया है।
क्या है घटना?
घटना के अनुसार, तिलौली निवासी मनोज जायसवाल पर आरोप है कि उन्होंने बिना टोल शुल्क दिए जबरन निकलने की कोशिश की। जब टोल कर्मचारी प्रभात पाण्डेय ने नियमों का हवाला दिया, तो कथित दबंग ने अपनी ‘औकात’ दिखाते हुए न केवल कर्मचारी के साथ मारपीट की, बल्कि जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।
नियमों की धज्जियां, समाज को चुनौती
मामला तब और गंभीर हो गया जब विवाद के दौरान एक विशिष्ट समुदाय के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। भीड़ जुटाकर टोल परिसर में तोड़फोड़ करना, बैरियर को नुकसान पहुंचाना और सरकारी राजस्व को पलीता लगाना—यह सब किसी आपराधिक मानसिकता के बिना संभव नहीं है। क्या टोल कर्मचारी अपनी ड्यूटी करने के लिए इसलिए मार खाएं क्योंकि वे कानून का पालन कर रहे थे?
पुलिस की चुप्पी, बढ़ता आक्रोश
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी गंभीर घटना के बाद भी पुलिस प्रशासन की कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? टोल प्रबंधन ने शिकायत दर्ज कराई है, साक्ष्य मौजूद हैं, लेकिन आरोपियों के हौसले आज भी बुलंद हैं। क्या पुलिस किसी दबाव में है? या फिर किसी बड़े राजनीतिक संरक्षण की प्रतीक्षा की जा रही है?
कर्मचारियों में इस कदर आक्रोश है कि यदि जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई, तो वे उग्र आंदोलन को विवश होंगे। सिद्धार्थनगर की जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या पुलिस का ‘डंडा’ केवल कमजोरों पर चलता है, या फिर बेलगड़ा टोल प्लाजा पर कानून हाथ में लेने वाले इन ‘दबंगों’ पर भी प्रशासन का इकबाल कायम होगा?
प्रशासन को चेतने की जरूरत
टोल प्लाजा पर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना जिला प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि टोल कर्मियों को ड्यूटी के दौरान ही सुरक्षित महसूस नहीं कराया गया, तो कल को किसी बड़ी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता।
समय आ गया है कि पुलिस प्रशासन ‘दबंगई’ को जड़ से उखाड़ फेंकने का संदेश दे। अपराधियों को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि टोल की सड़क पर नियम सबके लिए समान हैं—चाहे वह कोई आम नागरिक हो या खुद को ‘दबंग’ समझने वाला कोई स्थानीय रसूखदार।
न्याय की प्रतीक्षा में कर्मचारी, और सवाल की कतार में सिद्धार्थनगर प्रशासन।















