
अजीत मिश्रा (खोजी)
“जब सर्किल पुलिस का लहू..‘सरकार’ से ज़्यादा ‘इकरार’ का नमक चख ले” !
दरोगा जी : “सत्येंद्र जी बोल रहे हैं ?”
मैं : “जी, जनाब ।”
दरोगा जी : “जो आपने दरख़ास्त दी है… वो काफी गंभीर है । इससे जुड़े सबूत हैं क्या आपके पास ?”
मैं : “जी, पूरी तरह ।”
दरोगा जी : “इसमें तो जांच एजेंसियों के भी नाम हैं…”
मैं : “जी, बिल्कुल ।”
दरोगा जी : “तो आप हमसे क्या चाहते हैं ?”
मैं : “या तो मुकदमा दर्ज लिख दीजिए… या फिर सबूतों के आधार पर रिपोर्ट लगाकर ऊपर भेज दीजिए ।”
बातचीत का निष्कर्ष वही निकला जो अक्सर होता है ! शाहपुर पुलिस ने तहरीर को देख तो लिया, समझ भी लिया, लेकिन उसे छूने की हिम्मत नहीं दिखाई । क्योंकि “व्यवस्था को टरकाने” की कला जिसने साध ली हो, उसके लिए ऐसी फाइलें किसी “गर्म तवे” से कम नहीं होतीं । अंततः मामला खूबसूरती के साथ लुढ़काते हुए थाना राजघाट की गोद में डाल दिया गया । हाँ, इतना ज़रूर है कि “शाहपुर पुलिस” की बातचीत में “मिठास” थी ! एक ऐसी मिठास, कि फ़रियादी तुरंत “मायूस” न हो जाए । “काम न करने की कला” और “मीठा बोलने की तहज़ीब”—दोनों का ऐसा “संगम” आजकल “दुर्लभ” है !
दूसरा संवाद : जब तहरीर “छिछोड़े” ही सही….. मगर “जहाँपनाह” के खिलाफ हो…
जैसे ही राजघाट थाने में हमारी तहरीर पहुँची, और दरोगा जी ने ‘अपने आका’ का नाम उसमें लिखा देखा….वैसे ही उनकी आवाज़ का टोन पल भर में “सरकारी से निजी” हो गया । ऐसा लगा जैसे उनके “लहू” में “सरकार” से ज्यादा “इकरार” का “नमक” घुला हुआ हो । उनकी झुँझलाहट सुनकर ऐसा भ्रम हुआ कि मानो… मैंने “दरगाह” की “शहरपनाह” में “सेंध” लगा दी हो….जैसे “वेश्याओं के जहाँपनाह” की शान में “ख़ता-ए-क़बीर” कर दी हो….जैसे “राष्ट्रविरोधी साज़िशें” उजागर कर कोई “गुनाह-ए-अज़ीम” कर दिया हो….और “तहरीर” किसी “नापाक मंसूबे” पर नहीं…बल्कि किसी के “पेट” पर “लात” बनकर पड़ी हो ।
हम भी तो यही चाहते हैं दरोगा जी, कि इस बार भी आप अपनी आदत के अनुसार कोई फर्जी रिपोर्ट ही लगाएं….क्योंकि यदि आप ऐसा नही करेंगे…. तो जाँच के दायरे और जाँच की सूची में नामों की लिस्ट लंबी कैसे होगी ? वैसे भी आप पर पता नही कौन सा “जिन्नादि साया” मेहरबान है….जो अपने तमाम “कर्मकांडों” के बाद भी…आप पिछले पाँच सालों से भी अधिक समय से घूम फिर कर “कोतवाली सर्किल” मे ही बने रहते हैं । आपसे “पीड़ित” दुकानदार और “ठेले खोमचे वाले” लोग तो यह बताते हैं कि… यदि आप के खिलाफ एक “डिस्प्रोस्पोनेट असेट्स” की जाँच हो जाये…. तो बरामद माल गिनने के लिए कम से कम आठ दस मशीनें लगेंगी !
मोहब्बत के अचानक जागे पैग़ाम…
जब तहरीर देने वाले एक अन्य व्यक्ति के नाम के रूप में “सम्पादक” महोदय चिन्हित हुए…तो “तिवारी बाबा” की पड़ने वाली चौकी के दरोगा जी पर “मोहब्बत का साया” अचानक टूट पड़ा । दो दिनों के अंदर चौकी से इतने “चौकाने” वाले कॉल आए… जैसे लगता था कि सम्पादक महोदय “राष्ट्रहित” में नहीं, बल्कि “विधि विरुद्ध” काम में शामिल हों । हर बार एक ही संदेश “मिलना था… कुछ ज़रूरी काम है…”! पर सम्पादक महोदय भला क्यों जाएँ ? और वो भी तब, जब मामला इतना “संवेदनशील” हो ! जब “साजिशों” की जड़ें पूरे “सर्किल क्षेत्र” की जमीनों में धंसी हुई हों…और वातावरण “कच्चे धागे”-सा “तनावपूर्ण” हो ! अब इस स्थिति में कौन “मूर्ख” खुद चलकर जाए और “संभावित खतरे” को गले लगाए ? और वो भी तब…जब इतने “संवेदनशील मामले” के आरोपी लोग अपनी “दलाली से ओतप्रोत टाइप” की “चवन्नी छाप माइक” लेकर आपके “सर्किल” के थानों पर ही “धूनी रमाये” बैठे रहेंगे । अब देखिए न, आपके पास तो सम्पादक महोदय गए नहीं…..लेकिन संपादक महोदय के साथ तमाम अकीदतमंद लोग “पाक दरगाह” की आड़ में की जा रही आपकी इस “घटियाई” के विरोध में “एडीजी साहब” के पास “ज्ञापन” देने पहुँच गए ।

“पत्रकार संदीप मिश्रा” की मिसाल और ठगों का तांडव..
कुशीनगर की ताज़ा घटना सामने ही है— पत्रकार “संदीप मिश्रा” को “कसया थाने” से फोन कर बुलाया गया कि… आपके खिलाफ “तहरीर” पड़ी है ! और थाने बुलाकर “ठग कंपनी” के “गुंडों” के हाथ सौंप दिया गया । थाने में पुलिसकर्मियों के सामने दुर्व्यवहार,धमकियाँ,और वीडियो जबरन डिलीट करने का “तांडव” चलता रहा और फोन कर पत्रकार को बुलाने वाली पुलिस केवल “दर्शक” बनी रही ।
अब “इज़हार-ए-मोहब्बत” नहीं, “इकरार-ए-जुर्म” की बारी है

ये फोटो तो पहचानते ही होंगे इकरार साहब उर्फ “जहाँपनाह–ए–हरम” ! सुना है कि, शहर में “अवैध निर्माणों” का ये वही “ठेकेदार” है… जिसका सम्बन्ध थाना चिलुआताल मे दर्ज कराये गए फर्जी छेड़खानी के मुक़दमे की “साजिश” से जुड़ा है । सुना है कि ये वही “क़ादिर” है जिसका अपने भाई “कबीर” से प्रॉपर्टी का विवाद चल रहा रहा था ! और ये भी सुना है कि, “प्रॉपर्टी विवाद” में जिस “कबीर” के बेटे के खिलाफ, फर्जी छेड़खानी और रंगदारी का मुकदमा थाना चिलुआताल मे दर्ज हुआ है… वो “कबीर” इसी शख्स “क़ादिर” का भाई भी है ! अब आप जहाँ हों और वहाँ “घटियाई” का मुक़दमा दर्ज “न” हो…. तो फिर ये “खता–ए–कबीर” हो जाएगा ! अब बहुत हो चुका “मुतवल्ली साहब”। बहुत कर चुके आप अपने “हनीट्रैप गैंग” से अपनी मोहब्बत का “इज़हार”..और अपने “संगीन गुनाहों” से “इन्कार”। अब वक्त है कि आप अपने जुर्म का “इकरार” कीजिए । क्योंकि जब “नीयत” “शक्ल” “ईमान” और “शहरपनाहें” सड़ी हुई हों…तो बाहर के “दुश्मन” नहीं—बल्कि अंदर के “पहरेदार” ही शहर के लिए “असली खतरा” बन जाते हैं । और वैसे भी इस बार आपके “कुकर्मों की आग” को आपके “सर्किल क्षेत्र” का दमकल तो नहीं बुझा पायेगा..इस बार तो “सेंट्रल” को ही मैदान में उतरना होगा ।








