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बस्ती।। कमीशन के ‘ऑपरेशन’ में सरकारी तंत्र फेल, 70 क्षेत्रों में प्रसव दर हुई ‘शून्य’!

।। कागजों पर दौड़ता स्वास्थ्य विभाग, हकीकत में निजी अस्पतालों की तिजोरियां भर रहीं 'आशाएं'।

अजीत मिश्रा (खोजी)

कमीशन की भेंट चढ़ती माताओं की सुरक्षा: कब जागेगा प्रशासन?

शुक्रवार 16 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। स्वास्थ्य विभाग में ‘सेवा’ शब्द अब धीरे-धीरे ‘सौदा’ में तब्दील होता जा रहा है। जिले से आई हालिया रिपोर्ट ने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी है। जहाँ एक तरफ सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं जमीन पर हकीकत यह है कि 70 आशा कार्यकर्ताओं के क्षेत्र में प्रसव दर शून्य पाई गई है। सवाल यह उठता है कि क्या इन क्षेत्रों में बच्चों ने जन्म लेना बंद कर दिया है, या फिर सरकारी सिस्टम की आँखों पर ‘कमीशन’ की पट्टी बंधी हुई है?

⭐’निजी’ स्वार्थ के आगे ‘सरकारी’ तंत्र फेल

खबर के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों को प्रसव का लक्ष्य पूरा करने में पसीने छूट रहे हैं, जबकि निजी अस्पतालों की चांदी कट रही है। इसके पीछे का गणित सीधा है—कमीशन का लालच। सूत्रों की मानें तो एक सामान्य प्रसव पर आशा कार्यकर्ताओं और दलालों का हिस्सा तय होता है। सिजेरियन (ऑपरेशन) के मामलों में तो यह खेल और भी बड़ा हो जाता है, जहाँ परिजनों की जेब से 30 से 40 हजार रुपये ढीले कराए जाते हैं।

यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि गरीबों के हक पर डाका है। सरकारी अस्पताल में जो प्रसव मुफ्त या न्यूनतम खर्च पर होना चाहिए, उसे निजी लाभ के लिए ‘प्राइवेट’ गलियारों में धकेल दिया जाता है।

⭐कागजों पर ‘सुपरविजन’, जमीनी हकीकत ‘शून्य’

मरवटिया उपकेंद्र का मामला तो सिस्टम की बेशर्मी की पराकाष्ठा है। जहाँ कागजों पर सुपरवाइजर क्षेत्र का दौरा कर रहे थे, वहीं हकीकत में घर पर प्रसव हो रहे थे। एक महिला के नौ में से पांच बच्चों की मौत हो जाना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के चेहरे पर एक काला धब्बा है। जब रिपोर्ट में लापरवाही की पुष्टि हो चुकी है, तो आखिर सीएमओ स्तर से अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या जांच की रिपोर्टें सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए होती हैं?

⭐व्यवस्था पर तीखे सवाल:

जवाबदेही किसकी?: क्या केवल 70 आशा कार्यकर्ताओं को नोटिस थमा देना काफी है? उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी जिनकी नाक के नीचे यह ‘कमीशन का खेल’ चल रहा है?

96 लाख का हिसाब कहाँ?: जब 96 लाख रुपये किन खातों में गए इसका पता ही नहीं है, तो यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं।

गरीब की जान की कीमत क्या?: घर पर प्रसव होने से होने वाली मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या चंद रुपयों के कमीशन के लिए किसी की जान जोखिम में डालना जायज है?

नोटिस जारी करना एक प्रक्रिया हो सकती है, समाधान नहीं। जब तक बिचौलियों, भ्रष्ट कर्मचारियों और निजी अस्पतालों के इस ‘नेक्सस’ को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक गरीब माताएं इसी तरह असुरक्षित रहेंगी। प्रशासन को कागजी खानापूर्ति छोड़कर धरातल पर कड़े कदम उठाने होंगे, वरना ‘शून्य प्रसव दर’ का यह आंकड़ा एक दिन पूरे सरकारी तंत्र की साख को शून्य कर देगा।

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