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योगी सरकार में पत्रकार असुरक्षित? जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल

देश के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार आज सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं। जिन हाथों में कलम है, जिन कैमरों में सच कैद होता है, जिन आवाजों से जनता तक हकीकत पहुंचती है, आज उन्हीं पत्रकारों को डराने, धमकाने और झूठे मुकदमों में फंसाने का खेल खुलेआम खेला जा रहा है। सवाल सीधा है—क्या अब इस देश में सच दिखाना गुनाह हो गया है?

एक तरफ सरकारें मंचों से पत्रकार सम्मान की बातें करती हैं, सुरक्षा देने के दावे करती हैं, और दूसरी तरफ जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट नजर आती है। खबर दिखाओ तो फोन पर धमकी, भ्रष्टाचार उजागर करो तो मुकदमा, सवाल पूछो तो दबाव। आखिर कब तक सच बोलने वालों की आवाज दबाई जाएगी?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने सार्वजनिक मंचों से कहा था कि पत्रकारों के साथ अभद्रता करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी, धमकी देने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन आज प्रदेश के कई हिस्सों से ऐसी शिकायतें सामने आती हैं कि पत्रकारों की सुनवाई तक नहीं होती। कई मामलों में शिकायत करने वाला पत्रकार ही जांच के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है। आखिर क्यों?

सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से है—क्या बिना निष्पक्ष जांच के किसी पत्रकार पर मुकदमा दर्ज कर देना आसान रास्ता बन चुका है? क्या दबंगों और रसूखदारों के दबाव में कलमकारों को कुचला जा रहा है? अगर ऐसा है तो यह सिर्फ पत्रकार पर हमला नहीं, लोकतंत्र पर सीधा प्रहार है।

पत्रकार दिन-रात जनता के लिए काम करता है। धूप हो या बारिश, दंगा हो या हादसा, चुनाव हो या भ्रष्टाचार का खुलासा—हर मोर्चे पर पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर सच सामने लाता है। लेकिन जब उसी पत्रकार को धमकी मिले, जब उस पर जानलेवा हमले हों, जब उसे फर्जी मुकदमों में फंसाया जाए, तो यह व्यवस्था की नाकामी नहीं तो और क्या है?

सरकार को जवाब देना होगा कि पत्रकार सुरक्षा कानून अब तक क्यों नहीं बना? प्रशासन को बताना होगा कि पत्रकारों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं होती? आखिर क्यों अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और सच लिखने वाले डरे हुए हैं?

यदि कलम डर गई, कैमरा झुक गया और सच बोलने वाली आवाजें खामोश हो गईं, तो जनता तक सच कौन पहुंचाएगा? लोकतंत्र की रीढ़ कहे जाने वाले चौथे स्तंभ को कमजोर करना देश को कमजोर करना है।

अब समय आ गया है कि पत्रकार एकजुट हों, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं और सरकार से जवाब मांगें। क्योंकि अगर आज पत्रकार चुप रहा, तो कल सच हमेशा के लिए खामोश हो जाएगा।

जनता पूछ रही है — पत्रकार सुरक्षित कब होंगे?

सरकार जवाब दे — सच बोलना अपराध है या अधिकार?

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