
बस्ती का ‘दारुल उलूम’ या भीख का अड्डा? मासूमों से भीख मंगवाकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं मदरसा संचालक
कलम की जगह भीख का कटोरा: बस्ती का 'दारुल उलूम' बना माफियाओं का अड्डा! मिड-डे मील के रहते मासूमों से भीख मंगवा रहे 'शिक्षा के ठेकेदार'
अजीत मिश्रा (खोजी)
’मदरसा’ या ‘भीख का अड्डा’: बस्ती के इस शर्मनाक कारनामे पर कब तक खामोश रहेगा प्रशासन?
ब्यूरो, बस्ती मंडल
- बस्ती में ‘शिक्षा’ का काला चेहरा: प्रिंसिपल की ‘भीख वसूली’ से सहमे मासूम
- क्या प्रशासन की मिलीभगत से चल रहा ‘भीख का धंधा’? बस्ती में आक्रोश!
- कप्तानगंज मदरसा विवाद: मासूमों के बचपन का ‘शोषण’, दोषियों पर कार्रवाई की मांग तेज
- ‘पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब’, पर यहाँ तो भीख मांग रहे हैं बच्चे; मदरसा प्रशासन पर फूटा गुस्सा
बस्ती के कप्तानगंज स्थित ‘दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुनबी’ मदरसे से सामने आई तस्वीरें न केवल विचलित करने वाली हैं, बल्कि यह मानवता और शिक्षा व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा हैं। जिस जगह का काम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करना था, वहां के तथाकथित ‘शिक्षाविद’ और ‘प्रिंसिपल’ अपनी जेबें भरने के लिए नन्हे-मुन्नों को कड़कती धूप में भीख मांगने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
शर्मनाक: ‘मिड-डे मील’ के बाद भी भीख का खेल
आरोप है कि मदरसे के प्रिंसिपल अब्दुल मन्नान और मैनेजर हाजी मुनीर अली, मासूम बच्चों को भीषण गर्मी में भीख मांगने के लिए मजबूर करते हैं। एक तरफ सरकार मदरसों के बच्चों के लिए राशन और मिड-डे मील का बजट दे रही है, तो दूसरी तरफ मदरसा संचालक बच्चों को गांव-गांव भेजकर अनाज और पैसे मंगवा रहे हैं। बच्चों को डराया जाता है कि यदि उन्होंने नाम लिया या शिकायत की, तो उन्हें मदरसे से बाहर निकाल दिया जाएगा। यह शिक्षा नहीं, बल्कि बच्चों का शोषण है।
शिक्षा के नाम पर यह कैसा घिनौना खेल?
खबरों के अनुसार, मदरसे के प्रिंसिपल अब्दुल मन्नान और मैनेजर हाजी मुनीर अली का यह कृत्य किसी अपराध से कम नहीं है। हद तो तब हो जाती है जब ये लोग बच्चों को यह डराकर भेजते हैं कि अगर उन्होंने किसी को अपनी पहचान बताई, तो उन्हें मदरसे से निकाल दिया जाएगा। एक ओर सरकार मदरसों और स्कूलों में बच्चों के लिए ‘मिड-डे मील’ जैसी योजनाओं का बजट जारी करती है, वहीं दूसरी ओर इन बच्चों के पेट की आग बुझाने का बहाना बनाकर मासूमों से झोलियां भरवाई जा रही हैं।
मिलीभगत का काला सच
सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि आखिर इतने लंबे समय से यह धंधा चल कैसे रहा है? क्या जिला प्रशासन, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और शिक्षा महकमा पूरी तरह से सो रहा है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रिंसिपल और मैनेजर द्वारा अधिकारियों को ‘हिस्सा’ पहुँचाया जाता है, जिसके कारण इन पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। क्या बच्चों का बचपन इसलिए है कि वे अधिकारियों और भ्रष्ट मैनेजरों की तिजोरियाँ भरें?सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये मदरसा संचालक इतने बेखौफ कैसे हैं? क्या इनकी पहुंच जिले के आला अधिकारियों तक है? स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, इस भ्रष्टाचार का एक हिस्सा संबंधित अधिकारियों तक भी पहुँचता है, जिसके चलते अभी तक कोई कठोर कार्रवाई नहीं हो पाई है। क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले ये ‘माफिया’ कानून से ऊपर हैं?
हमारी मांग – सख्त कार्रवाई हो
यह महज एक मदरसा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। हम प्रशासन से मांग करते हैं कि:
- प्रिंसिपल और मैनेजर को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और उन पर बाल शोषण व भीख मंगवाने के गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हो।
- मदरसे की मान्यता रद्द की जाए और वहां पढ़ रहे बच्चों के भविष्य की सुरक्षित व्यवस्था सरकार अपने हाथों में ले।
- उच्च स्तरीय जांच हो: पिछले कुछ वर्षों में मिले सरकारी अनुदान का हिसाब-किताब सार्वजनिक किया जाए और इसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका की जांच हो।
अब कार्रवाई नहीं, तो फिर कब?
भीख मंगवाना न केवल एक सामाजिक अपराध है, बल्कि यह कानूनन जुर्म है। बाल श्रम और बच्चों के शोषण के दायरे में आने वाले इस मामले में केवल एफआईआर दर्ज करना काफी नहीं है। हमें मांग करनी होगी:
- तत्काल गिरफ्तारी: प्रिंसिपल अब्दुल मन्नान और मैनेजर हाजी मुनीर अली को तुरंत गिरफ्तार किया जाए।
- जांच का दायरा: मदरसे की फंडिंग और सरकारी अनुदानों की निष्पक्ष जांच हो कि आखिर वह पैसा कहां जाता है।
- प्रशासनिक जवाबदेही: क्या कोई अधिकारी इस घृणित खेल में शामिल है? यदि हां, तो उसे भी सख्त से सख्त सजा मिले।

बस्ती की जनता अब और खामोशी बर्दाश्त नहीं करेगी। अगर इन अपराधियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती है, तो यह माना जाएगा कि प्रशासन खुद इस अपराध का संरक्षण कर रहा है। बच्चों की आंखों में आंसू और झोली में भीख, यह बस्ती के लिए कलंक है। इसे मिटाना अब अनिवार्य है। यह न केवल बस्ती, बल्कि पूरे देश के लिए एक कलंक है। अगर अब भी प्रशासन ने आंखें नहीं खोलीं, तो यह माना जाएगा कि बच्चों के इस शोषण में उनकी भी मौन सहमति है। बस्ती की जनता अब खामोश नहीं रहेगी; दोषियों को सलाखों के पीछे देखना ही इकलौता न्याय है।






















