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बिजली विभाग का ‘मौत का सौदा’: जेई के झूठे भरोसे पर घर बना बैठा बुजुर्ग, अब लाइन हटाने के लिए मांग रहे डेढ़ लाख!

गरीब की लाचारी, विभाग की 'रिश्वतखोरी': 11 केवी लाइन के साये में जीने को मजबूर परिवार, क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

बिजली विभाग की ‘रिश्वतखोरी’ के साये में जान जोखिम में डालता गरीब परिवार, क्या प्रशासन की संवेदना मर चुकी है?

  • सिस्टम की घोर लापरवाही: दो साल से जान जोखिम में डाले हुए है बिजली विभाग, घर के अंदर से गुजर रहा हाई-टेंशन पोल।
  • क्या अब जान बचाने के लिए भी देनी होगी रिश्वत? बिजली विभाग की दलाली से तंग बुजुर्ग का दर्द।
  • जिम्मेदार कौन? बिजली विभाग की मनमानी के आगे बेबस बुजुर्ग, छत के लिए मांग रहे ‘डेढ़ लाख की घूस’।

बस्ती: क्या सरकारी तंत्र अब गरीबों की जान का सौदागर बन गया है? बस्ती जिले के कलवारी उपकेंद्र क्षेत्र के वैष्णोपुर गाँव की यह तस्वीर न केवल बिजली विभाग की घोर लापरवाही को बयां कर रही है, बल्कि उस क्रूर व्यवस्था की पोल भी खोल रही है, जहाँ एक बुजुर्ग परिवार दो साल से ‘मौत के साये’ में जीने को मजबूर है।

​क्या है पूरा मामला?

​एक गरीब बुजुर्ग, कुंज बिहारी, ने अपने जीवन भर की जमा-पूंजी लगाकर एक पक्का मकान बनाने का सपना देखा था। निर्माण से पहले ही उन्होंने बिजली विभाग को सूचित किया कि उनके घर के ऊपर से 11,000 वोल्ट की खतरनाक हाई-टेंशन लाइन गुजर रही है। उस समय के ‘जिम्मेदार’ जेई ने आश्वासन का लॉलीपॉप थमाया और परिवार ने उस पर भरोसा कर लिया।

​दो साल बीत गए, एक साल पहले नया पोल भी लगा दिया गया, लेकिन लाइन आज भी वहीं है। और अब, विभाग की संवेदनहीनता का चरम देखिए—अब बिजली विभाग उस लाइन को शिफ्ट करने के नाम पर पीड़ित परिवार से डेढ़ लाख रुपये की अवैध मांग कर रहा है!

​सवाल सिस्टम से:

  • किसका है यह ‘इस्टीमेट’? जब बिजली विभाग को पहले ही सूचित कर दिया गया था, तो लाइन को हटाने की जिम्मेदारी विभाग की थी या गरीब की? क्या अब जान बचाने के लिए भी गरीब को विभाग को ‘सुविधा शुल्क’ देना होगा?
  • मौत का इंतजार क्यों? घर के बीचों-बीच से गुजरती हाई-टेंशन लाइन और कंक्रीट का पोल किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे रहे हैं। क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही नींद से जागेगा?
  • खोखले वादे कब तक? ग्रामीणों के विरोध और सोशल एक्टिविस्टों की आवाज के बाद भी जेई का वही पुराना रटा-रटाया बयान कि ‘शिकायत का निस्तारण कराया जाएगा’, एक भद्दे मजाक जैसा है।

​यह लापरवाही नहीं, अपराध है

​दो साल से एक बुजुर्ग परिवार का डर के साये में बिना छत के रहना, बिजली विभाग की प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है। क्या विभाग के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए इस लाइन को हटा सके?

​सीडीओ गौतम शर्मा ने जांच का आश्वासन दिया है। लेकिन जनता अब सिर्फ जांच नहीं, तत्काल कार्रवाई और राहत चाहती है। यदि यह विभाग आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो इसे चलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

​समय रहते जाग जाइए, इससे पहले कि उस घर में कोई अनहोनी हो और पूरे विभाग के माथे पर एक और ‘हत्या’ का कलंक लगे!

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