
सांसों पर पहरा: ‘के.एम. एग्रो’ की जहरीली हवा में घुट रहा है ग्राम कोड़रा पांडेय, प्रशासन मौन!
विकास या जहर? बस्ती में 10,000 ग्रामीणों की जान से खेल रही 'के.एम. एग्रो' की धूल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की फाइलों में दबी 10,000 लोगों की चीखें, कब जागेगा प्रशासन? 'के.एम. एग्रो' के धुएं से दम तोड़ता बचपन और बीमार होती जवानी; प्रदूषण विभाग बना मूकदर्शक
अजीत मिश्रा (खोजी)
विकास या विनाश? ग्राम कोड़रा पांडेय के 10,000 लोग जहरीली हवा में घुटने को मजबूर, ‘के.एम. एग्रो’ की धूल से बेहाल
- अधिकारियों की चुप्पी, फैक्ट्री की मनमानी; प्रदूषण के जहर में डूब रहा है ग्राम कोड़रा पांडेय
- यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की लापरवाही से खतरे में कोड़रा पांडेय के 10,000 ग्रामीणों का स्वास्थ्य
- शिकायतें दर्ज, सबूत पेश, फिर भी कार्रवाई शून्य: ‘के.एम. एग्रो’ पर प्रशासन मेहरबान क्यों?
बस्ती: विकास की चकाचौंध के पीछे अक्सर आम आदमी की सांसें किस तरह दम तोड़ रही हैं, इसकी बानगी उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के ग्राम कोड़रा पांडेय में देखी जा सकती है। यहाँ स्थित ‘के.एम. एग्रो उद्योग एलएलपी’ (K M AGRO UDYOG LLP) से निकलने वाली जहरीली धूल और सूक्ष्म कणों (PM2.5 और PM10) ने लगभग 10,000 ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है।
सांसों पर भारी पड़ रही फैक्ट्री की लापरवाही
आसपास के रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोग हर दिन जहरीले कणों से भरी हवा में सांस लेने को अभिशप्त हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों में गहराई तक जाकर अस्थमा, एलर्जी, गंभीर श्वसन रोग और हृदय संबंधी बीमारियों को न्योता देते हैं। यहाँ की हवा में घुली यह राख बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है।
फाइलों में दबी शिकायतें, जिम्मेदार मौन
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने इस समस्या को लेकर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) को कई बार ईमेल के माध्यम से शिकायतें भेजीं और साक्ष्य के रूप में तस्वीरें व वीडियो भी उपलब्ध कराए। लेकिन, विभाग की उदासीनता के चलते आज तक न तो फैक्ट्री की जांच हुई और न ही कोई प्रभावी कार्रवाई देखने को मिली। सवाल यह उठता है कि क्या प्रदूषण विभाग किसी बड़ी दुर्घटना या स्वास्थ्य आपातकाल का इंतजार कर रहा है?
ग्रामीणों की प्रशासन से सीधी मांग
10,000 से अधिक लोगों के स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर चल रहे इस उद्योग के खिलाफ ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
- तत्काल वैज्ञानिक जांच: फैक्ट्री से निकलने वाले उत्सर्जन का स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षण हो, ताकि हवा में मौजूद जहरीले कणों की असल मात्रा का पता चल सके।
- उपकरणों की ऑडिट: प्रदूषण नियंत्रण के लिए फैक्ट्री में लगाए गए उपकरणों की कार्यक्षमता की निष्पक्ष जांच हो।
- पारदर्शिता: जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए ताकि ग्रामीणों को पता चल सके कि वे कितनी जहरीली हवा पी रहे हैं।
- कठोर कानूनी कार्रवाई: यदि मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो फैक्ट्री प्रबंधन के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए और जब तक सुधार न हो, फैक्ट्री को सील किया जाए।
विकास जनता की कीमत पर नहीं
ग्रामवासियों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की नींव जनता के स्वास्थ्य पर नहीं रखी जा सकती। स्वच्छ हवा में सांस लेना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे फैक्ट्री की मनमानी के कारण छीना जा रहा है।
क्या प्रशासन की नींद तब खुलेगी जब गांव का हर दूसरा व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाएगा?
अब वक्त आ गया है कि बस्ती का जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी जिम्मेदारी निभाएं और इस ‘प्रदूषण के जहर’ से 10,000 जिंदगियों को बचाएं।














