
सरयू नदी पर बने टांडा पुल की मरम्मत कार्य की धीमी गति लोगों के लिए बना सिरदर्द
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। लगातार दवाओं के सहारे चल रहा टांडा पुल अब आईसीयू में।।
बस्ती, 05 अक्टूबर 2025
सरयू नदी पर बने टांडा पुल की मरम्मत कार्य की धीमी गति अब लोगों के लिए सिरदर्द बन चुकी है। बस्ती, अकबरपुर, आजमगढ़ और बनारस को जोड़ने वाला यह पुल क्षेत्र की प्रमुख आर्थिक और परिवहन धुरी माना जाता है। लगभग 2.32 किलोमीटर लंबा यह पुल कलवारी-माझा सरयू (घाघरा) नदी पर बना है और पिछले एक दशक में कई बार मरम्मत के लिए बंद किया जा चुका है। अब एक बार फिर मरम्मत कार्य के चलते पुल “आईसीयू” जैसी स्थिति में पहुंच गया है।

👉 11 सितम्बर 2025 से बंद हुआ आवागमन
पुल पर 11 सितम्बर से बड़े और चार पहिया वाहनों का आवागमन पूरी तरह रोक दिया गया है। वर्तमान में सिर्फ दोपहिया वाहन आ जा रहे हैं , वह भी सीमित दायरे में।
👉 धीमी रफ्तार से हो रहा मरम्मत कार्य
मरम्मत कार्य शुरू तो कर दिया गया है, लेकिन उसकी रफ्तार बेहद सुस्त है। इससे स्थानीय लोगों, व्यापारियों और यात्रियों को भारी असुविधा हो रही है। जहां पहले बस्ती से बनारस तक व्यापारी इसी मार्ग से आसानी से माल की ढुलाई करते थे, अब उन्हें लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है, जिससे समय और परिवहन लागत दोनों बढ़ गए हैं।
👉 पुल का इतिहास: शिलान्यास से उद्घाटन तक
इस 2.32 किलोमीटर लंबे पुल का शिलान्यास मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रीत्व काल में तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव के हाथों हुआ था। लगभग 10 साल बाद अखिलेश यादव की सरकार में शिवपाल सिंह यादव द्वारा ही इसका उद्घाटन किया गया। लेकिन उद्घाटन के कुछ ही समय बाद पुल में निर्माण संबंधी खामियां सामने आने लगीं और तब से अब तक कई बार इसे मरम्मत के लिए बंद करना पड़ा है।
👉 घटिया सामग्री और कमीशनखोरी के आरोप
सूत्रों के अनुसार पुल निर्माण के समय ही घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। बताया जाता है कि उस दौर में माफिया और वसूली सिंडिकेट की मिलीभगत से भारी कमीशनखोरी हुई, जिसके कारण निर्माण मानकों की अनदेखी की गई। नतीजतन, पुल के जॉइंट और ढांचे में शुरुआती वर्षों में ही दरारें और क्षति दिखने लगीं।
👉 व्यापार और आम जनता पर असर
टांडा पुल बंद होने से व्यापारिक गतिविधियों पर गहरा असर पड़ा है। बस्ती और आसपास के जिलों के व्यापारी बनारस से आने-जाने के लिए इसी मार्ग को प्राथमिकता देते थे क्योंकि यह सबसे छोटा और सुविधाजनक रास्ता था। अब वैकल्पिक मार्गों से माल लाना-ले जाना न सिर्फ महंगा साबित हो रहा है बल्कि समय भी दोगुना लग रहा है। वहीं आम यात्रियों, स्कूली बच्चों और मरीजों को भी लंबे रूट से गुजरना पड़ रहा है।
👉 प्रशासन पर उठ रहे सवाल
मरम्मत कार्य की धीमी प्रगति को लेकर स्थानीय नागरिकों में नाराजगी है। उनका कहना है कि जिस प्रकार धीमी गति से कार्य हो रहा है जिनकी समय सीमा पहले 3 महीने बताया जा रहा था अब उसे 6 महीने बताया जा रहा है वह एक साल में भी पूरा हो जाए तो बड़ी बात होगी। वहीं लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर काम में गति नहीं बढ़ाई गई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
टांडा पुल की मरम्मत कार्य की रफ्तार बढ़ाना प्रशासन और निर्माण एजेंसी के लिए अब चुनौती बन गया है। यह पुल न केवल परिवहन का एक अहम जरिया है, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की धड़कन भी है। मरम्मत में और देरी ने लोगों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।





















