
स्वास्थ्य व्यवस्था का ‘यमराज’ या ‘भगवान’? आजमगढ़ के मंडलीय अस्पताल में मानवता हुई शर्मसार
अजीत मिश्रा (खोजी)
आजमगढ़: क्या सरकारी अस्पतालों में गरीब की जान की कोई कीमत नहीं है? क्या ‘धरती के भगवान’ कहे जाने वाले डॉक्टर अब ‘यमराज’ की भूमिका में आ गए हैं? आजमगढ़ के मंडलीय अस्पताल से आई एक घटना ने न केवल स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि पूरे सभ्य समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वास्तव में एक संवेदनशील समाज में जी रहे हैं?
व्यवस्था का क्रूर चेहरा
हाल ही में सामने आई एक तस्वीर और उस पर एक बेटे की चीख पूरे सिस्टम को आईना दिखा रही है। एक बेटा जो अपनी बीमार वृद्ध मां को इलाज की उम्मीद लेकर मंडलीय अस्पताल लाया था, वह आज इंसाफ की जगह मौत की भीख मांग रहा है। वह चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है, “साहब, मुझे फांसी पर चढ़ा दीजिए।” यह केवल एक व्यक्ति का आक्रोश नहीं, बल्कि उस लाचारी की पराकाष्ठा है जो एक आम आदमी सरकारी तंत्र के सामने महसूस करता है।
शर्मनाक वाकया: मां के सामने पीटा गया बेटा
आरोप है कि जब पीड़ित अपनी मां के इलाज के लिए डॉक्टरों से गुहार लगा रहा था, तब उसे न केवल अस्पताल से धक्का देकर बाहर निकाला गया, बल्कि मानवता की सभी सीमाएं लांघते हुए, उस वृद्ध मां के सामने ही उसके बेटे को बुरी तरह पीटा गया। मां का चश्मा तोड़ दिया गया और उस बेटे की आंखों के सामने उसकी मां की बेबसी का तमाशा बनाया गया।
सवाल यह उठता है कि आखिर किस कानून या चिकित्सा शपथ (Hippocratic Oath) के तहत डॉक्टर को यह अधिकार मिला कि वह मरीज या उसके परिजनों के साथ हिंसा करे?
’भ्रष्ट सिस्टम’ की बलि चढ़ता आम आदमी
आजमगढ़ का मंडलीय अस्पताल अक्सर चर्चाओं में रहता है, लेकिन इस बार मामला किसी मशीन के खराब होने या दवाई न होने का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के मरने का है।
- जवाबदेही का अभाव: क्या प्रशासन इस मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगा, या फिर फाइलें दबाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा?
- भय का माहौल: क्या गरीब आदमी के लिए सरकारी अस्पताल अब खौफ की जगह बन गए हैं, जहां इलाज से ज्यादा अपमान और मार का डर है?
जनता पूछ रही है सवाल
आजमगढ़ का स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन अब तक मौन क्यों है? क्या ये ‘सफेद कोट’ पहने लोग कानून से ऊपर हैं? यदि एक बेटा अपनी मां के इलाज के लिए इलाज मांगते हुए फांसी की मांग कर रहा है, तो यह उस स्वास्थ्य व्यवस्था की ‘डेथ वारंट’ है।
समय आ गया है कि इस भ्रष्ट सिस्टम की जड़ें हिलाई जाएं। दोषियों के खिलाफ केवल निलंबन जैसी खानापूर्ति नहीं, बल्कि कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि फिर किसी और मां को अपने बेटे के सामने अपमानित न होना पड़े और न ही किसी बेटे को इलाज के लिए अपनी जान की भीख मांगनी पड़े।
प्रशासन जागे, इससे पहले कि व्यवस्था पर से आम आदमी का भरोसा पूरी तरह उठ जाए!
कानूनी सवाल और प्रशासन की जिम्मेदारी
“यह घटना केवल एक दुर्व्यवहार नहीं, बल्कि भारतीय न्याय संहिता के तहत एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आती है। अस्पताल परिसर में हिंसा करना और चिकित्सा सहायता से वंचित करना न केवल व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) है, बल्कि यह मानवाधिकारों का भी खुला उल्लंघन है। क्या आजमगढ़ प्रशासन और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) इस घटना पर FIR दर्ज कर दोषियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करेंगे? या फिर ये आरोपी अपनी पहुंच और ओहदे का लाभ उठाकर कानून की आंखों में धूल झोंकते रहेंगे?”
“यह सिर्फ एक अस्पताल का मामला नहीं है, यह उस खोखले सिस्टम की तस्वीर है जिसे ‘स्वास्थ्य सेवा’ का नाम दिया गया है। अगर आज इस पर लगाम नहीं लगी, तो कल कोई और बेटा अपने सिस्टम की बर्बरता के आगे घुटने टेकने पर मजबूर होगा।”
















