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बस्ती: भ्रष्टाचार की ‘लाल’ क्रॉस! रेड क्रॉस सोसाइटी में नियमों की बलि, क्या डीएम की नाक के नीचे हो रहा बड़ा खेला?

बस्ती रेड क्रॉस में 'अंधेर नगरी चौपट राजा': नियमों की अर्थी निकाल गुपचुप चुन लिए गए सभापति!

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: बस्ती रेड क्रॉस सोसाइटी में ‘संविधान’ तार-तार, सेवा के नाम पर सत्ता की बंदरबांट!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (यूपी)

  • भ्रष्टाचार की ‘लाल’ क्रॉस: अविश्वास के घेरे में कुर्सी का खेल, क्या DM की नाक के नीचे हुआ बड़ा घोटाला?
  • लोकतंत्र शर्मसार! बिना साधारण सभा और सूचना के कैसे ‘चुने’ गए रेड क्रॉस के आका?
  • रेड क्रॉस सोसाइटी या ‘निजी जागीर’? आरटीआई के सवालों ने उधेड़ी प्रशासनिक मिलीभगत की परतें!
  • बस्ती: सेवा के नाम पर ‘सत्ता’ का सर्कस, त्यागपत्र और अविश्वास के भंवर में फंसी रेड क्रॉस सोसाइटी।
  •  रेड क्रॉस में ‘संविधान’ तार-तार, रसूखदारों ने बंद कमरे में लिखी चुनाव की पटकथा।
  •  अविश्वास की फाइलों पर जमी धूल, क्या अपनों को बचाने में जुटा है जिला प्रशासन?
  • धमाका: डॉ. प्रमोद के इस्तीफे का ‘सस्पेंस’ और 23 अप्रैल का ‘रहस्यमयी’ चुनाव, आरटीआई ने मांगा जवाब।
  •  रेड क्रॉस सोसाइटी में नियमों की बलि, ‘सुदृष्टि’ की आरटीआई से हड़कंप!

बस्ती। जनपद में इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी अब ‘मानव सेवा’ का केंद्र न रहकर ‘विवादों का अखाड़ा’ बन चुकी है। 23 अप्रैल 2026 को जिस नाटकीय अंदाज में नए सभापति के चुनाव का दावा किया गया, उसने संस्था के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोध और प्रशासनिक मिलीभगत को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या बस्ती रेड क्रॉस सोसाइटी अब किसी के ‘निजी एजेंडे’ से संचालित होगी?पीड़ित मानवता की सेवा का दम भरने वाली इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी, शाखा बस्ती इस समय सेवा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता के खेल और नियमों की धज्जियां उड़ाने को लेकर चर्चा में है। ताजा मामला सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए सवालों से जुड़ा है, जिसने जिले के प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया है। आरोपों के घेरे में सीधे तौर पर सोसाइटी के जिम्मेदार और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली है।

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अविश्वास के ‘भंवर’ में डूबी नैतिकता

पूरा मामला अक्टूबर 2025 से गहराया हुआ है। जब संस्था के 7 निर्वाचित कार्यकारिणी सदस्यों ने सभापति, उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, तब उम्मीद थी कि निष्पक्ष जांच होगी। लेकिन छह महीने बीत जाने के बाद भी उस प्रस्ताव पर की गई ‘नोटिंग’ और जिलाधिकारी के निर्णय को सार्वजनिक न करना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं दाल में कुछ काला है।

बड़ा सवाल: जब नेतृत्व पर भरोसा ही नहीं रहा, तो उन्हीं चेहरों के इर्द-गिर्द संस्था की चाबी घुमाने की कोशिश क्यों की जा रही है?

इस्तीफे का ‘सस्पेंस’ और मनोनयन का खेल

सभापति डॉ. प्रमोद कुमार चौधरी ने 20 मार्च 2026 को अपना त्यागपत्र जिलाधिकारी (अध्यक्ष, रेड क्रॉस) को सौंपा। कायदे से इस इस्तीफे पर तत्काल कार्रवाई कर नियमानुसार प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। लेकिन आरोप है कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस इस्तीफे को दबाए रखा गया और फिर 23 अप्रैल को अचानक ‘सोशल मीडिया’ के जरिए नए सभापति के चुने जाने की खबर फैला दी गई।अभिलेखों और जनसूचना के जरिए उठाए गए सवालों की मानें तो रेड क्रॉस सोसाइटी बस्ती में ‘लोकतंत्र’ नहीं, बल्कि ‘मनतंत्र’ चल रहा है। सबसे बड़ा सवाल 23 अप्रैल 2026 को हुए तथाकथित चुनाव पर है। सोशल मीडिया पर खबर तैर रही है कि उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में नए सभापति का चुनाव कर लिया गया। सवाल यह उठता है कि जब सभापति, उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष तीनों के खिलाफ अक्टूबर 2025 में ही कार्यकारिणी सदस्यों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका था, तो किस नियम के तहत इस चुनाव की स्क्रिप्ट लिखी गई?

इन तीखे सवालों का जवाब कौन देगा?

  • अविश्वास की फाइलों पर धूल क्यों? जब 7 कार्यकारिणी सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव दिया था, तो उस पर अब तक निर्णय क्यों नहीं लिया गया? क्या किसी रसूखदार को बचाने की कोशिश हो रही है?
  • नोटिस का अतापता नहीं: 23 अप्रैल के चुनाव के लिए क्या सभी सदस्यों को विधिवत सूचना दी गई थी? या फिर खास ‘करीबियों’ के बीच ही सत्ता बांट ली गई?
  • नियमों को ठेंगा: रेड क्रॉस के संविधान के विरुद्ध जाकर बिना साधारण सभा के चुनाव कराना क्या सीधे तौर पर जिलाधिकारी के आदेशों की अवहेलना नहीं है?

बिना कोरम और बिना सूचना के कैसी वोटिंग?

बताते चलें कि पूर्व सभापति डॉ. प्रमोद कुमार चौधरी ने 20 मार्च 2026 को ही अपना इस्तीफा जिलाधिकारी/अध्यक्ष को सौंप दिया था। अब तक उस इस्तीफे पर क्या कार्रवाई हुई, यह फाइलों में दफन है। लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि बिना ‘साधारण सभा’ (General Body) बुलाए, गुपचुप तरीके से कुछ सदस्यों को मिलाकर नए सभापति का चयन कर लिया गया। रेड क्रॉस के संविधान के अनुसार, किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय या चुनाव के लिए ‘साधारण सभा’ (General Body) का बुलाया जाना अनिवार्य है। सुदृष्टि नरायन त्रिपाठी द्वारा मांगी गई जनसूचना ने प्रशासन की दुखती रग पर हाथ रख दिया है:

  • क्या चुनाव की सूचना सभी सदस्यों को रजिस्टर डाक या प्रमाणित माध्यम से दी गई?
  • क्या इस चुनाव को जिलाधिकारी या मुख्य चिकित्साधिकारी (उपाध्यक्ष) की लिखित अनुमति प्राप्त थी?
  • यदि अविश्वास प्रस्ताव उपाध्यक्ष के खिलाफ भी था, तो उन्होंने किस अधिकार से बैठक की अध्यक्षता की और नया सभापति चुन लिया?

प्रशासनिक साख पर बट्टा

इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के अध्यक्ष पद पर जिलाधिकारी जैसा जिम्मेदार पद बैठा है। ऐसे में संस्था के भीतर ‘नवीन-प्रवीण गठजोड़’ (जैसा कि अन्य विभागों में चर्चा रही है) की तर्ज पर अगर नियमों को ताक पर रखकर नियुक्तियां हो रही हैं, तो यह सीधे तौर पर जिला प्रशासन की साख को चुनौती है। जनता पूछ रही है कि क्या रेड क्रॉस की संपत्तियों और फंड पर कब्जा जमाए रखने के लिए यह सारा ‘सर्कस’ रचा जा रहा है?

आरटीआई की चोट से थर्राया विभाग

अब जब ₹10 के पोस्टल आर्डर के साथ जनसूचना के कड़े सवाल अपर जिलाधिकारी के मेज पर पहुंच चुके हैं, तो जवाब देते नहीं बन रहा है। प्रमाणित साक्ष्य मांगे गए हैं—चाहे वह बैठक की कार्यवाही (Minutes) हो या सदस्यों की उपस्थिति के हस्ताक्षर। अगर ये साक्ष्य नहीं मिलते, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि 23 अप्रैल का ‘स्वयंभू चुनाव’ पूरी तरह अवैध था और यह संस्था की गरिमा के साथ खिलवाड़ है।

प्रशासनिक मिलीभगत या गहरी लापरवाही?

रेड क्रॉस सोसाइटी के अध्यक्ष स्वयं जिलाधिकारी होते हैं और उपाध्यक्ष मुख्य चिकित्साधिकारी। उनकी नाक के नीचे नियमों के विरुद्ध जाकर चुनाव हो जाना और अविश्वास प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल देना, जिला प्रशासन की मंशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आखिर वो कौन सी अदृश्य ताकत है जो रेड क्रॉस सोसाइटी को अपनी निजी जागीर समझकर चला रही है?

सुदृष्टि नरायन त्रिपाठी द्वारा मांगी गई जनसूचना ने इस पूरे मामले की परतें उधेड़ दी हैं। अब देखना यह है कि जन सूचना अधिकारी और अपर जिलाधिकारी बस्ती इन सवालों का क्या जवाब देते हैं, या फिर हमेशा की तरह ‘गोलमोल’ जवाब देकर भ्रष्टाचार की इस ‘लाल’ इमारत को ढहाने से बचा लिया जाएगा।

खोज जारी है… अंदरूनी गठजोड़ का पर्दाफाश जल्द!

ब्यूरो की नजर: क्या जिलाधिकारी बस्ती इस ‘अवैध कब्जे’ पर संज्ञान लेंगे या फिर भ्रष्ट तंत्र के सिपहसालार ऐसे ही नियमों की धज्जियां उड़ाते रहेंगे? रेड क्रॉस की इस ‘काली कहानी’ में अभी कई और पन्ने खुलने बाकी हैं।

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