

🚨⚖️ “चर्च की ज़मीन पर करोड़ों का खेल!” इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला—डीएम के आदेश रद्द, बिक्री वैध करार, प्रशासन की शक्तियों पर बड़ा सवाल 🚨⚖️
सहारनपुर/लखनऊ/बिजनौर से सामने आई इस बड़ी कानूनी खबर ने देशभर में चर्च संपत्तियों को लेकर चल रहे विवाद को एक नई दिशा दे दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 मार्च 2014 को अपने अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया कि किसी भी रजिस्टर्ड बिक्री (Sale Deed) को “अवैध” घोषित करने का अधिकार जिलाधिकारी (DM) के पास नहीं है, बल्कि यह अधिकार केवल सक्षम सिविल कोर्ट के पास ही होता है। यह मामला Civil Misc. Writ Petition No. 48017/2010 (Parmarth Marketing Pvt. Ltd.) और Writ Petition No. 34174/2010 (Lalit Kumar Agarwal) से जुड़ा हुआ था, जिसमें Methodist Church in India की बिजनौर स्थित मिशन कंपाउंड की करीब 2.5453 हेक्टेयर कृषि भूमि की बिक्री को लेकर विवाद खड़ा हुआ था, जिसकी डील लगभग ₹4.21 करोड़ में तय हुई थी। चर्च के मोरादाबाद रीजन ने इस जमीन को बेचने का निर्णय लिया था ताकि चर्च संपत्तियों के रखरखाव और प्रबंधन के लिए धन जुटाया जा सके, और इसके लिए बाकायदा अखबारों में टेंडर जारी कर बोली प्रक्रिया पूरी की गई थी।
लेकिन जैसे ही बिक्री प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंची, प्रशासन ने हस्तक्षेप करते हुए 27 फरवरी 2010 को रजिस्ट्री रोकने, 23 अप्रैल 2010 को अनुमति देने से इनकार करने और 19 जून 2010 को सेल डीड को ही “शून्य (Void)” घोषित करने जैसे आदेश जारी कर दिए, जिससे मामला सीधे अदालत पहुंच गया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि संबंधित जमीन कृषि भूमि है, कोई धार्मिक स्थल नहीं, इसलिए Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 लागू नहीं होता, और DM को सेल डीड रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। वहीं राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि Bombay Public Trust Act, 1950 के तहत Charity Commissioner की अनुमति आवश्यक थी।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बेहद स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि DM ने अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग किया है। अदालत ने माना कि संबंधित भूमि “place of worship” नहीं बल्कि कृषि भूमि थी, इसलिए Places of Worship Act लागू नहीं होता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि Bombay Public Trust Act की बाध्यता महाराष्ट्र राज्य तक सीमित है और उत्तर प्रदेश में स्थित संपत्ति पर इसका सीधा लागू होना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 10 अगस्त 2000 के सरकारी आदेश का गलत अर्थ निकालते हुए प्रशासन ने अनावश्यक हस्तक्षेप किया, जबकि वह आदेश केवल जांच और विवेकपूर्ण निर्णय के लिए था, न कि हर मामले में रोक लगाने के लिए।
इस महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने DM द्वारा जारी तीनों आदेश—रजिस्ट्री रोकना, अनुमति से इनकार करना और सेल डीड को अवैध घोषित करना—को पूरी तरह “अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर” बताते हुए रद्द कर दिया। इस फैसले ने एक बड़ा कानूनी सिद्धांत स्थापित किया कि चर्च या किसी भी धार्मिक संस्था की हर संपत्ति स्वतः “धार्मिक स्थल” नहीं मानी जा सकती, और प्रशासनिक अधिकारी संपत्ति के स्वामित्व या वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दे सकते।
यह निर्णय इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि देशभर में चर्च संपत्तियों को लेकर Indian Church Trustees, Church of North India और Church of India Pakistan Burma and Ceylon जैसे संगठनों के बीच स्वामित्व को लेकर बड़े स्तर पर विवाद चल रहे हैं। ऐसे में यह फैसला साफ संकेत देता है कि प्रशासनिक हस्तक्षेप सीमित है और अंतिम निर्णय केवल न्यायालय ही करेगा।
कुल मिलाकर, यह फैसला न सिर्फ बिजनौर की जमीन तक सीमित है, बल्कि देशभर में चल रहे चर्च संपत्ति विवादों के लिए एक मजबूत कानूनी मिसाल बनकर उभरा है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं—न प्रशासन, न कोई संस्था—और संपत्ति विवादों का अंतिम समाधान केवल न्यायपालिका के हाथ में ही है।
✍ रिपोर्ट: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
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