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आग और भू-धंसान की छाया से निकलकर बेलगड़िया की महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, सफलता की लिखी नई कहानी

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*धनबाद :* बेलगड़िया पुनर्वास टाउनशिप, जिसकी पहचान अग्नि प्रभावित और भू-धंसान वाले इलाके से पुनर्वासित हुए लोगों के रूप में होती है, पहले सुविधाओं के अभाव और बेरोजगारी से जूझ रहा था. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. आज इसी बेलगड़िया से बदलाव और आत्मनिर्भरता की ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो पूरे झारखंड के लिए मिसाल बन सकती है. यहां करीब 40 से 50 महिलाएं मशरूम की खेती कर अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं. कभी विस्थापन और असुरक्षा से जूझने वाली ये महिलाएं आज सम्मान के साथ रोजगार कर रही हैं और अपने परिवार का पालन-पोषण भी कर रही हैं.

बेलगड़िया पुनर्वास टाउनशिप में आज महिलाओं के हाथों में सिर्फ घरेलू जिम्मेदारियां नहीं, बल्कि रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई ताकत भी है. स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर करीब 40 से 50 महिलाएं मशरूम उत्पादन का कार्य कर रही हैं. मौसम के अनुसार अलग-अलग किस्म के मशरूम उगाए जाते हैं. फिलहाल यहां ओएस्टर और मिल्की मशरूम का उत्पादन किया जा रहा है. इससे पहले बटन मशरूम की खेती भी सफलतापूर्वक की जा चुकी है.
*मशरूम की खेती ने महिलाओं की बदली जिंदगी*
मशरूम उत्पादन से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का माध्यम भी बन गया है. प्रशिक्षण लेकर महिलाएं वैज्ञानिक तरीके से खेती कर रही हैं. देवघर से आने वाले विशेषज्ञ समय-समय पर उन्हें नई तकनीकों की जानकारी देते हैं.

वर्तमान में प्रतिदिन चार से पांच किलो मशरूम का उत्पादन हो रहा है. हालांकि महिलाओं का कहना है कि यदि उन्हें एयर कंडीशनिंग (एसी) युक्त भवन और बड़ा कार्यस्थल मिल जाए तो उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है. पहले उत्पादन 15 से 20 किलो प्रतिदिन तक पहुंच जाता था, लेकिन सीमित संसाधनों और जगह की कमी के कारण अब उत्पादन प्रभावित हो रहा है.

सबसे खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाले मशरूम को बाजार ले जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती. आसपास के लोग सीधे उत्पादन केंद्र पहुंचकर ताजा मशरूम खरीदकर ले जाते हैं. गुणवत्ता और ताजगी के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे महिलाओं की आय भी बढ़ रही है.
मशरूम की खेती ने इन महिलाओं की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव लाया है. पहले जहां परिवार चलाने में मुश्किलें आती थीं, वहीं अब नियमित आमदनी होने लगी है. महिलाएं अपने बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और दूसरी जरूरतों को खुद पूरा करने में योगदान दे रही हैं. यही वजह है कि अब गांव की अन्य महिलाएं भी इस काम से जुड़ने के लिए आगे आ रही हैं.
संघर्ष से सफलता की मिसाल बनीं महिलाएं, बदली कॉलोनी की छवि, दूर हुई आशंकाएं
बेलगड़िया पुनर्वास कॉलोनी को लेकर कभी लोगों के मन में कई तरह की आशंकाएं और भ्रांतियां थीं. लेकिन यहां रहने वाली महिलाओं का कहना है कि अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. बेहतर आवास, बुनियादी सुविधाएं और रोजगार के अवसर मिलने से उनका जीवन पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक हो गया है. उनका मानना है कि जो लोग अब भी यहां आने से हिचक रहे हैं, वे वास्तविक स्थिति से अनजान हैं.

बेलगड़िया की यह कहानी सिर्फ मशरूम उत्पादन की नहीं, बल्कि संघर्ष से सफलता तक के सफर की कहानी है. कभी आग प्रभावित और भू-धंसान वाले क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं आज अपने हाथों से रोजगार पैदा कर रही हैं. आत्मनिर्भर भारत और महिला सशक्तिकरण की अवधारणा को ये महिलाएं जमीन पर साकार कर रही हैं.

यदि इन्हें आधुनिक संसाधन, बड़ा उत्पादन केंद्र और बेहतर विपणन की सुविधा मिले, तो बेलगड़िया का मशरूम सिर्फ धनबाद ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की पहचान बन सकता है. बेलगड़िया की इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि यदि अवसर, प्रशिक्षण और हौसला मिले तो कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी सफलता में बदला जा सकता है. आग और भू-धंसान की पहचान रखने वाला बेलगड़िया आज मशरूम उत्पादन और महिला आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बन रहा है

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