
अजीत मिश्रा (खोजी) ।। कुदरहा की ‘त्रिमूर्ति’ ने किया सरकारी खजाने का तर्पण; कागजों पर बह रही विकास की गंगा।।
।। सूत्रों का दावा है कि जेई कृष्ण प्रताप गिरी खुलेआम कहते हैं कि 'सिस्टम' को कैसे मैनेज किया जाता है, यह उन्हें बखूबी पता है। यही वजह है कि अन्य पंचायतों के प्रधान-सचिव भी यहाँ आकर भ्रष्टाचार के 'शॉर्टकट' सीखते हैं। मंझरिया अब ग्राम पंचायत नहीं, बल्कि 'लूट की पाठशाला' बन चुका है।।
।। बस्ती: मंझरिया में ‘अशिक्षित’ प्रधान बना ढाल, सचिव और जेई की ‘जुगलबंदी’ ने लूटा सरकारी खजाना।।
कुदरहा ब्लॉक में भ्रष्टाचार का ‘मंझरिया मॉडल’ उजागर; डीसी मनरेगा की चुप्पी पर उठे सवाल, कागजों में पल रहे मजदूर और हकीकत में पलायन की मजबूरी।
02 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती। जनपद के कुदरहा विकास खंड अंतर्गत ग्राम पंचायत मंझरिया इन दिनों विकास के नाम पर विनाश और भ्रष्टाचार की नई इबारत लिख रहा है। यहाँ सरकारी खजाने को लूटने के लिए एक ऐसा ‘त्रिदेव’ सिंडिकेट सक्रिय है, जिसने नैतिकता और नियम-कानून को ताक पर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि इस लूट खसोट में एक अशिक्षित प्रधान को ‘सुरक्षा कवच’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि पर्दे के पीछे खेल सचिव घनश्याम और जेई कृष्ण प्रताप गिरी खेल रहे हैं।
भ्रष्टाचार की ‘ट्रेनिंग’ का केंद्र बना मंझरिया
क्षेत्र में चर्चा है कि जेई कृष्ण प्रताप गिरी भ्रष्टाचार के ऐसे ‘महारथी’ हैं, जिनसे कई गांवों के सचिव और प्रधान धन उगाही और सरकारी बजट को ठिकाने लगाने की ट्रेनिंग लेते हैं। सूत्रों की मानें तो साहब के ‘कनेक्शन’ ऊपर तक इतने मजबूत हैं कि जांच की फाइलें पहुंचने से पहले ही रफा-दफा हो जाती हैं। यही कारण है कि बिना कार्य कराए ही सरकारी धन की बंदरबांट यहाँ एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।
मनरेगा: कागजी मजदूरों का मायाजाल
मंझरिया में मनरेगा की स्थिति ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ जैसी है। यहाँ वास्तविक मजदूर काम की तलाश में परदेस पलायन करने को विवश हैं, जबकि मास्टर रोल में ‘कागजी मजदूरों’ की फर्जी हाजिरी लगाकर लाखों रुपये डकारे जा रहे हैं। गांव की दुर्दशा ऐसी है कि सड़कों और नालियों की तस्वीर देखकर जिम्मेदार खुद शर्मसार हो जाएं, लेकिन यहाँ तो ‘भ्रष्टाचार की मलाई’ ने जिम्मेदारों की आंखों पर पट्टी बांध दी है।
धृतराष्ट्र की भूमिका में डीसी मनरेगा?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल उच्चाधिकारियों की भूमिका पर खड़ा होता है। जिले के डीसी मनरेगा संजय कुमार आखिर इस खुली लूट पर मौन क्यों हैं? जब गांव में निर्माण कार्यों में भारी अनियमितता और फर्जी हाजिरी का खेल सरेआम चल रहा है, तब भी उच्चाधिकारियों का ‘धृतराष्ट्र’ बने रहना यह संकेत देता है कि शायद भ्रष्टाचार की यह कमान कहीं और से संचालित हो रही है।
बड़ा सवाल: कैसे रुकेगी लूट?
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और वसूली की कमान खुद जिम्मेदारों के हाथों में हो, तो भ्रष्टाचार पर लगाम की उम्मीद बेमानी लगती है। मंझरिया गांव आज विकास की राह देख रहा है, लेकिन उसे मिल रहे हैं सिर्फ अधूरे मानकविहीन निर्माण और फाइलों में दर्ज झूठे विकास के दावे। क्या जिलाधिकारी बस्ती इस सिंडिकेट पर नकेल कसेंगे या फिर मंझरिया का सरकारी धन इसी तरह भ्रष्टाचारियों की तिजोरी भरता रहेगा?
🙈मंझरिया का ‘महाभारत’: अंधे बने अधिकारी, शिखंडी बना प्रधान और लूट रहे ‘जेई-सचिव’ के कौरव!
🙊बस्ती में भ्रष्टाचार का ‘इंजीनियरिंग मॉडल’: बिना ईंट रखे ही मंझरिया में निकल जा रही सरकारी रकम।
🙉कुदरहा की ‘त्रिमूर्ति’ ने किया सरकारी खजाने का तर्पण; कागजों पर बह रही विकास की गंगा।
1. ‘अशिक्षा’ का फायदा और ‘अनुभव’ का खेल:
“मंझरिया में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। यहाँ प्रधान की ‘अशिक्षा’ सचिव और जेई के लिए वरदान साबित हो रही है। जिस प्रधान को गांव की तकदीर बदलनी थी, उसे केवल डिजिटल सिग्नेचर (DSC) और अंगूठे तक सीमित कर दिया गया है। असली रिमोट कंट्रोल जेई कृष्ण प्रताप गिरी के पास है, जिनके इशारे पर बजट की बंदरबांट होती है।”
2. अधिकारियों के ‘मजबूत कनेक्शन’ की दीवार:
“आखिर क्या वजह है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद जेई और सचिव पर आंच नहीं आती? चर्चा आम है कि इन भ्रष्टाचारियों ने ऊपर तक ‘वसूली का नेटवर्क’ इतना पुख्ता कर रखा है कि जिला मुख्यालय पर बैठे साहबान भी इनके आगे नतमस्तक हैं। डीसी मनरेगा की चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि लूट के इस खेल में हिस्सेदारी का दायरा बहुत बड़ा है।”





















