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परशुरामपुर में पुलिसिया संरक्षण में ‘मौत’ का तांडव: गांव-गांव धधक रही भट्टियां, खाकी मौन!

साहब को खबर नहीं या 'सुविधा शुल्क' का है कमाल? परशुरामपुर में बेलगाम हुए शराब माफिया, कानून को दिखा रहे ठेंगा!

अजीत मिश्रा (खोजी)

खाकी की नाक के नीचे ‘मौत’ का कारोबार: परशुरामपुर में धधक रही हैं अवैध शराब की भट्टियां

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • बस्ती: परशुरामपुर पुलिस की नाक के नीचे बह रही कच्ची शराब की नदियाँ, क्या किसी बड़े ‘कांड’ का है इंतजार?
  • खाकी पर भारी शराब माफिया: परशुरामपुर के दर्जनों गांवों में जहर की खेती, बेपरवाह प्रशासन!
  • जटौलिया से लेकर सोनबरसा तक जहरीली शराब का साम्राज्य, आखिर कब जागेगा बस्ती प्रशासन?

बस्ती। जनपद के परशुरामपुर थाना क्षेत्र में इन दिनों कानून का इकबाल खत्म होता नजर आ रहा है। आलम यह है कि समूचे क्षेत्र में अवैध कच्ची शराब का काला धंधा पूरी तरह बेलगाम हो चुका है। गांव-गांव में धधकती शराब की भट्टियां न केवल शासन के आदेशों को ठेंगा दिखा रही हैं, बल्कि मासूम ग्रामीणों की जिंदगी से भी खिलवाड़ कर रही हैं। हैरत की बात यह है कि जिम्मेदार अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।

मौत के अड्डों की लंबी फेहरिस्त

परशुरामपुर थाना क्षेत्र का शायद ही कोई कोना इस जहर से अछूता बचा हो। सूत्रों और स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक:

  • कुश्मौरडीह तिराहा, नागपुर कुंवर और हड़ही में भट्टियां दिन-रात आग उगल रही हैं।
  • सिकंदरपुर, करिगहना और नेवादा चौरी जैसे इलाके इस अवैध कारोबार के मुख्य सुरक्षित अड्डे बन चुके हैं।
  • जटौलिया, बरहपुर और पचौहा में खुलेआम जहरीली शराब तैयार की जा रही है।
  • अचरवल, कुसमौर और जिगिनिया में कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।
  • सोनबरसा और बेरता में तो रात-दिन निर्माण और सप्लाई का खेल बड़े पैमाने पर जारी है।

साहब को खबर नहीं या ‘बखरे’ का है खेल?

स्थानीय ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि यह पूरा नेटवर्क पुलिस की मिलीभगत से फल-फूल रहा है। चर्चा है कि कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है और छोटे-मोटे प्यादों को पकड़कर फाइल बंद कर दी जाती है। अंदरखाने की खबर यह है कि इस धंधे से होने वाली काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा ‘ऊपर’ तक पहुंच रहा है, यही वजह है कि जहरीली शराब के सौदागर बेखौफ होकर अपना नेटवर्क फैला रहे हैं।

सवालों के घेरे में सिस्टम

  • जब भी इन अवैध अड्डों की शिकायत की जाती है, जिम्मेदार अधिकारी ‘अनभिज्ञता’ जताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। सवाल यह उठता है कि:
  • क्या स्थानीय पुलिस इतनी पंगु हो गई है कि उसे गांव-गांव चल रही भट्टियों की भनक तक नहीं?
  • क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी (शराब कांड) का इंतजार कर रहा है?
  • आखिर क्यों जिम्मेदारों की सरपरस्ती में यह मौत का व्यापार फल-फूल रहा है?
  • “जिम्मेदारों की खामोश रजामंदी और बेपरवाह प्रशासन ने परशुरामपुर को बारूद के ढेर पर बिठा दिया है। अगर समय रहते इन शराब माफियाओं पर नकेल नहीं कसी गई, तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता।”

अब देखना यह होगा कि इस रिपोर्ट के बाद जिला प्रशासन और पुलिस कप्तान की नींद टूटती है या फिर कागजों में ‘सब ठीक है’ का खेल यूं ही चलता रहेगा।

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