
बस्ती: सरकारी अस्पताल या शुक्लाजी की जागीर? हर्रैया 100-एम.एस.एच. में ‘सिस्टम’ वेंटिलेटर पर!
बस्ती का 'अंधेर नगरी-चौपट राजा' अस्पताल: सीएमएस नदारद, फार्मासिस्ट 'शुक्लाजी' के हाथ में कमान! हर्रैया 100-MSH: सरकारी सेवा या निजी जागीर? रजिस्टर जेब में लेकर घूमते हैं शुक्लाजी!
अजीत मिश्रा (खोजी)
हर्रैया सरकारी अस्पताल या ‘शुक्लाजी’ की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी? बस्ती मंडल में स्वास्थ्य सेवाओं का जनाजा: CMS बेबस, फार्मासिस्ट बना ‘अघोषित मालिक’, भगवान भरोसे मरीज
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- सिस्टम वेंटिलेटर पर! हाजिरी से लेकर पर्ची तक… शुक्लाजी की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।
- साहब! यहाँ सीएमएस नहीं, फार्मासिस्ट ही ‘मालिक’ है: हर्रैया अस्पताल की खुली पोल।
- दोपहर 2 बजे के बाद ‘राम भरोसे’ अस्पताल: डॉक्टर नदारद, गर्भवती महिलाओं की जान से खिलवाड़।
- सफेद कोट के पीछे काला खेल: ऑफलाइन पर्ची का मायाजाल और डॉक्टरों की ‘फर्जी’ हाजिरी।
- सीएमएस साहिबा का ‘महीने में चार दिन’ वाला वीआईपी कल्चर, कैसे सुधरेगी बस्ती की सेहत?
- अस्पताल या अवैध कमाई का अड्डा? हर्रैया में लूट और लापरवाही का ‘कॉम्बिनेशन’।
- बजरंग प्रसाद और शुक्लाजी की ‘जुगलबंदी’: रजिस्टर गायब, जनता बेहाल।
- सीएमओ की फटकार का भी असर नहीं, क्या रसूख के आगे नतमस्तक है प्रशासन?
- डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस का अड्डा बना हर्रैया, गरीब मरीज सिर्फ एक ‘आंकड़ा’।
बस्ती | ब्यूरो चीफ उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए भले ही पानी की तरह पैसा बहा रही हो, लेकिन बस्ती जनपद के हर्रैया स्थित 100 बेड (MSH) अस्पताल में हालात इसके उलट हैं। यहाँ के सिस्टम को देखकर ऐसा लगता है कि सरकार ने नहीं, बल्कि एक फार्मासिस्ट ने अपनी ‘जागीर’ खोल रखी है। अस्पताल में तैनात सीएमएस (CMS) और जिम्मेदार अधिकारी महज कठपुतली बनकर रह गए हैं, जबकि पूरी कमान ‘शुक्लाजी’ नामक फार्मासिस्ट के हाथ में है।
हाजिरी रजिस्टर का ‘मास्टरमाइंड’ और रसूख का खेल
अस्पताल में कौन डॉक्टर आएगा और किसकी गैरहाजिरी पर पर्दा डाला जाएगा, यह अस्पताल के कार्यालय से नहीं बल्कि फार्मासिस्ट शुक्लाजी के रसूख से तय होता है। नियमानुसार उपस्थिति पंजिका (Attendance Register) कार्यालय में होनी चाहिए, लेकिन यहाँ यह रजिस्टर शुक्लाजी के पास ‘बंधक’ रहता है। आरोप है कि वह अपनी पसंद के लोगों की हाजिरी लगवाते हैं और जो उनकी बात नहीं मानता, उसे सिस्टम से बाहर कर दिया जाता है। हैरत की बात यह है कि जिस उपस्थिति पंजिका (Attendance Register) को कार्यालय में होना चाहिए, वह ‘शुक्लाजी’ के संरक्षण में रहती है। आरोप है कि वह अपनी मर्जी से डॉक्टरों की हाजिरी लगाते हैं। जो डॉक्टर ड्यूटी से नदारद रहते हैं या देर से आते हैं, उन्हें बचाने के लिए ऑनलाइन पर्ची काटने के बजाय ऑफलाइन खेल खेला जाता है। 7 मई को जब सीएमओ (CMO) ने सुबह 11 बजे औचक निरीक्षण किया, तो खुद ‘शुक्लाजी’ रजिस्टर पेश करने में पसीने छोड़ते नजर आए। काफी देर बाद रजिस्टर उपलब्ध हुआ, जिससे साफ है कि अंदरखाने कुछ बड़ा ‘गोलमाल’ चल रहा है।
हाल ही में जब सीएमओ (CMO) ने सुबह 11 बजे औचक निरीक्षण किया, तो मौके पर अफरा-तफरी मच गई। डॉ. अजय पटेल और डॉ. अनीता वर्मा को छोड़कर बाकी कुर्सियां खाली थीं। जब सीएमओ ने हाजिरी रजिस्टर मांगा, तो शुक्लाजी उसे तुरंत पेश नहीं कर सके। काफी देर बाद जब रजिस्टर आया, तो दाल में काला साफ नजर आ रहा था। सीएमओ ने इस लापरवाही पर शुक्लाजी को कड़ी फटकार भी लगाई, लेकिन क्या एक फटकार इस भ्रष्टाचार के सिंडिकेट को तोड़ने के लिए काफी है?
दोपहर 2 बजे के बाद ‘अस्पताल’ बन जाता है ‘भूत बंगला’
इस अस्पताल की सबसे खौफनाक सच्चाई दोपहर 2 बजे के बाद सामने आती है। लंच ब्रेक के नाम पर जो डॉक्टर और कर्मचारी निकलते हैं, वे फिर वापस नहीं लौटते।
- गायब डॉक्टर: 2 बजे के बाद इमरजेंसी में भी डॉक्टर ढूंढने से नहीं मिलते।
- ताला बंद पैथोलॉजी: पैथोलॉजिस्ट और एलटी (LT) अपनी ड्यूटी को ताक पर रखकर गायब रहते हैं।
- लाचार मरीज: अगर किसी गरीब गर्भवती महिला को रात या शाम को इमरजेंसी हो जाए, तो उसकी जान भगवान भरोसे होती है। यहाँ तैनात स्टाफ नर्स और सुरक्षाकर्मी ही ‘डॉक्टर’ की भूमिका में नजर आते हैं, जो मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है।
निजी प्रैक्टिस का मोह या ड्यूटी से चोरी?
अस्पताल की सीएमएस पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि वह महीने में केवल 2 से 4 दिन ही अस्पताल आती हैं। वहीं डॉ. मनोज चौधरी जैसे नामचीन डॉक्टरों को लेकर चर्चा है कि जब उन्हें अपने निजी अस्पतालों से फुरसत मिलती है, तब वे सरकारी ड्यूटी की ‘खानापूर्ति’ करने हर्रैया आते हैं। अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती की सूची न तो कहीं चस्पा की जाती है और न ही सार्वजनिक की जाती है। पूरी जानकारी केवल बड़े बाबू बजरंग प्रसाद और शुक्लाजी की मुट्ठी में कैद रहती है।
लूट और कमीशन का खुला बाजार
मरीजों का आरोप है कि यहाँ ऑनलाइन पर्ची काटने में भी खेल होता है। डॉक्टरों को बचाने के लिए जानबूझकर ऑफलाइन पर्ची काटी जाती है ताकि रिकॉर्ड में हेराफेरी की जा सके। दवाइयों से लेकर जांच तक में कमीशनखोरी का बोलबाला है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह अस्पताल मरीजों के इलाज के लिए नहीं, बल्कि अवैध कमाई का जरिया बन गया है।
मुख्य बिंदु जो खड़े करते हैं गंभीर सवाल:
- अघोषित शासन: क्यों फार्मासिस्ट शुक्लाजी के इशारे पर चलता है पूरा अस्पताल?
- पर्ची का खेल: डॉक्टरों को बचाने के लिए ऑनलाइन सिस्टम की धज्जियां क्यों उड़ाई जा रही हैं?
- लापता डॉक्टर: दोपहर 2 बजे के बाद डॉक्टरों की तैनाती की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
- लूटतंत्र: क्या सरकारी अस्पताल अब केवल अवैध कमाई का जरिया बनकर रह गए हैं?
क्या बस्ती का जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस खुले भ्रष्टाचार पर अपनी आँखें मूंदे रखेगा? क्या ‘शुक्लाजी’ जैसे कर्मचारियों का रसूख शासन के नियमों से ऊपर है? अगर जल्द ही इस ‘सिंडिकेट’ पर नकेल नहीं कसी गई, तो हर्रैया अस्पताल केवल सफेद हाथी बनकर रह जाएगा और गरीब जनता यूं ही दम तोड़ती रहेगी।
हमा पैनी नजर इस मामले पर बनी रहेगी।
















