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‘एक’ का ‘बीस’ कमाने वाले अस्पताल, क्या अब इलाज के नाम पर ‘लाशों’ का सौदा हो रहा है?

स्वास्थ्य सेवा या लूट का अड्डा? 'एक का बीस' कमाने के लिए मरे हुए मरीजों को भी नहीं छोड़ रहे अस्पताल सफेदपोश लुटेरों का खुलासा: एनआईसीयू और आईसीयू में 'लाशें' रखकर वसूला जा रहा है मोटा पैसा

अजीत मिश्रा (खोजी)

एक रुपया लगाकर बीस रुपया: मानवता के सीने पर खड़ा भ्रष्टाचार का नया साम्राज्य

  • इलाज के नाम पर ‘एक का बीस’ बनाने का खेल: बिचौलियों और अस्पताल मालिकों की खौफनाक सांठगांठ
  • ‘भगवान’ बनने का ढोंग और मुनाफे की भूख: निजी अस्पतालों के अमानवीय कारोबार का कच्चा-चिट्ठा
  • बिना बीमारी के टेस्ट और कमीशन का धंधा: क्या आपका अस्पताल भी ‘एक का बीस’ कमा रहा है?

चिकित्सा के क्षेत्र में, जिसे कभी ‘देवदूतों’ का काम माना जाता था, अब ‘व्यापारी’ अपनी लालची उंगलियां घुसा चुके हैं। एक अस्पताल प्रबंधक का यह कबूलनामा, “मैं ‘एक’ रुपये में ‘बीस’ रुपया कमाता हूँ,” किसी भी इंसान की आत्मा को झकझोरने के लिए काफी है। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि हमारे समाज के नैतिक पतन और निजी स्वास्थ्य व्यवस्था के अमानवीय स्वरूप का एक क्रूर और स्पष्ट प्रमाण है।स्वास्थ्य सेवा के नाम पर मरीजों की जेब और उनकी जान से खिलवाड़ करने का एक ऐसा खुलासा हुआ है, जो आपको अंदर तक झकझोर देगा। जानकारी के अनुसार, निजी अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करना अब सेवा नहीं, बल्कि एक ‘मुनाफा कमाने वाला उद्योग’ बन गया है, जहाँ लक्ष्य सिर्फ एक ही है—’एक’ रुपया लगाकर ‘बीस’ रुपये कमाना।

कैसे काम करता है यह ‘मौत का गणित’?

रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे गोरखधंधे के पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। यह केवल डॉक्टर या अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित तंत्र है:

  • बिचौलियों का जाल: अस्पतालों द्वारा छोटे-मोटे ‘झोला छाप’ डॉक्टरों और आशा बहुओं को नियुक्त किया गया है। इन्हें प्रति केस 5,000 रुपये तक का कमीशन दिया जाता है। इनका एकमात्र काम किसी भी तरह मरीज को उस अस्पताल तक पहुँचाना होता है।
  • मरीजों को बनाना बंधक: अस्पताल का प्रबंधन यह सुनिश्चित करता है कि मरीज 15 से 20 दिनों तक आईसीयू (ICU) या एनआईसीयू (NICU) में रहे। चाहे मरीज की स्थिति में सुधार हो रहा हो या न हो, उसे डिस्चार्ज नहीं किया जाता क्योंकि जब तक मरीज वहां रहेगा, तभी ‘एक का बीस’ का लक्ष्य पूरा हो पाएगा।
  • अनावश्यक जांचों का बोझ: जिस मरीज को जरूरत नहीं होती, उससे भी आधे दर्जन से अधिक अनावश्यक टेस्ट करवाए जाते हैं। यह केवल मरीज की जेब खाली करने का एक तरीका है।

सोचिए, आखिर “एक का बीस” कैसे बनता है? क्या यह किसी ईमानदारी के व्यवसाय का मुनाफा है? क्या यह सेवा और गुणवत्ता का प्रतिफल है? नहीं, यह खून चूसने का, लूटने का और लाचारी का फायदा उठाने का एक ऐसा घिनौना खेल है, जिसे हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

इस खेल के खिलाड़ी कौन हैं? वे अस्पताल के मालिक हैं, वे ‘छोला छाप’ डॉक्टर हैं, और वे ‘आशारानी’ हैं जो मरीज लाने पर कमीशन लेते हैं। यह एक ऐसा मकड़जाल है जिसमें एक गरीब मरीज को तब तक फँसाकर रखा जाता है, जब तक उसकी सारी जमा-पूंजी और उसकी आखिरी साँस तक न निकल जाए।

जरा सोचिए, क्या ऐसी कमाई पर किसी को शर्म नहीं आती? क्या मृत बच्चों या मरीजों को आईसीयू और एनआईसीयू में सिर्फ इसलिए रखना ताकि “एक का बीस” का लक्ष्य पूरा हो सके, इंसानियत के नाम पर एक गहरा धब्बा नहीं है? सवाल उठाया गया है – “मरे हुए बच्चे या मरीज को एनआईसीयू और आईसीयू में रखते हैं, ताकि एक का 20 रुपया बनाया जा सके।” यह सिर्फ एक कल्पना नहीं, एक भयावह वास्तविकता है जिसे स्वीकार करने की हमें हिम्मत जुटानी होगी।शायद इस रिपोर्ट का सबसे डरावना और अमानवीय हिस्सा यह है कि ये अस्पताल अपनी कमाई के लिए नैतिकता की सभी सीमाएं लांघ चुके हैं। स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ये अस्पताल मरे हुए मरीजों या बच्चों को भी एनआईसीयू और आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखते हैं। इसका उद्देश्य केवल यह दिखाना होता है कि मरीज जीवित है, ताकि इलाज के बिल को और अधिक बढ़ाया जा सके और परिजनों से मोटी रकम वसूली जा सके।

समाजसेवी’ के नाम पर ढोंग

विडंबना देखिए, अपनी इस लूट को छिपाने के लिए ये अस्पताल के मालिक खुद को ‘भगवान’ और ‘समाजसेवी’ कहलवाना पसंद करते हैं। एक पूर्व जिला अस्पताल के डॉक्टर का अनुभव साझा करते हुए ् बताया गया है कि कैसे उन्हें अस्पताल प्रबंधन ने ‘एक का बीस’ का टार्गेट पूरा न कर पाने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया था। क्योंकि वे डॉक्टर मरीजों के इलाज को प्राथमिकता दे रहे थे, न कि मुनाफाखोरी को।

और सबसे ज्यादा विडंबना यह है कि ऐसे लोग समाज में खुद को “समाजसेवी” और “भगवान” का दर्जा देते हैं! जो लोग मरीजों की लाचारी को अपने मुनाफे का ज़रिया बनाते हैं, क्या वे भगवान कहलाने के हकदार हैं? यह एक ऐसा विरोधाभास है जिसे देखकर सिर्फ हँसी और शर्म ही आती है।

पत्रकारिता का गिरता स्तर

यह भ्रष्टाचार का खेल अकेले नहीं चल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘एक का बीस’ कमाने वाले इन अस्पतालों की कमाई से स्थानीय स्तर पर कई पत्रकारों की भी ‘रोजी-रोटी’ चल रही है। यह सांठगांठ ही मुख्य कारण है कि अस्पताल बेखौफ होकर अपनी लूट जारी रखे हुए हैं, क्योंकि उनकी हर गलत हरकत को दबाने के लिए एक तंत्र पहले से ही सक्रिय है।

इस ‘बीस रुपया’ की लालच ने कई पत्रकारों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। “एक का 20 रुपया कमाने वाले अस्पताल से कई पत्रकारों की रोजी रोटी भी चलती है।” क्या पत्रकारिता का यही धर्म है? क्या सत्ता और लालच के सामने सच्चाई को दबा देना ही मीडिया की ज़िम्मेदारी है?

यह समय जागने का है। हमें इस “एक का बीस” के खेल को समझना होगा और इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। हमें उन ‘व्यापारियों’ को पहचानना होगा जो मानवता के सीने पर अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। हमें यह सवाल पूछना होगा: आखिर हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था किसके लिए है? गरीबों और लाचारों के लिए, या फिर उन ‘व्यापारियों’ के लिए जो उनकी लाचारी का फायदा उठाकर “बीस रुपया” कमाते हैं?

ये तथ्य किसी एक अस्पताल की कहानी नहीं, बल्कि पूरे निजी स्वास्थ्य सेक्टर की उस कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। जब अस्पतालों में इलाज का पैमाना ‘स्वस्थ करना’ न होकर ‘मुनाफा कमाना’ हो जाए, तो समाज के लिए इससे बड़ा खतरा और क्या हो सकता है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि इन अस्पतालों के खिलाफ कड़ी जांच हो और इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ को बेनकाब किया जाए?

प्रश्न यह नहीं है कि ये अस्पताल पैसा कैसे कमा रहे हैं, प्रश्न यह है कि हम एक समाज के तौर पर ऐसी अमानवीय व्यवस्था को कब तक बर्दाश्त करते रहेंगे?

यह लेख किसी विशेष अस्पताल या व्यक्ति पर निशाना नहीं है, बल्कि उस ‘प्रवृत्ति’ पर है जो आज स्वास्थ्य व्यवस्था में गहरी जड़ें जमा चुकी है। यह एक आह्वान है, एक चेतावनी है, और एक सवाल है कि क्या हम ऐसे ही तमाशा देखते रहेंगे, या फिर इस “एक का बीस” के साम्राज्य को चुनौती देंगे।

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