उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती: लाइफ लाइन हॉस्पिटल की मनमानी पर मंडलायुक्त सख्त, पीड़ितों को न्याय का भरोसा

इलाज के नाम पर लूट और मासूमों की मौत: लाइफ लाइन हॉस्पिटल के खिलाफ मोर्चाबंदी तेज बस्ती में निजी अस्पतालों की मनमानी का मामला पहुंचा कमिश्नर तक; भाजपा नेता ने दी आंदोलन की चेतावनी

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती के लाइफ लाइन हॉस्पिटल की मनमानी के खिलाफ मंडलायुक्त तक पहुंचा मामला, पीड़ितों को मिला न्याय का आश्वासन

  • दोषी पाए जाने के बाद भी निजी अस्पताल पर सिर्फ जुर्माना? पीड़ितों ने लगाई न्याय की गुहार
  • क्या अब अस्पताल प्रबंधन पर होगी सख्त कार्रवाई? लाइफ लाइन हॉस्पिटल के कुकृत्यों पर गरमाया माहौल

बस्ती: जनपद के निजी अस्पतालों द्वारा चिकित्सा के नाम पर की जा रही लूट और मरीजों के शोषण का मामला अब गंभीर मोड़ ले चुका है। मामला शहर के दक्षिण दरवाजा स्थित ‘लाइफ लाइन हॉस्पिटल’ का है, जहाँ अस्पताल प्रबंधन पर मनमानी और गंभीर लापरवाही के आरोप लगे हैं।स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र जिसे ‘नोबेल प्रोफेशन’ माना जाता है, आज कुछ निजी अस्पतालों की काली करतूतों के कारण ‘अंधेर नगरी’ बन गया है।

क्या है पूरा मामला?

​आरोप बेहद गंभीर और रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। जिस डॉक्टर के पास बच्चों के इलाज की विशेषज्ञता नहीं है, उसके हाथों मासूमों का उपचार करवाना न केवल व्यावसायिक कदाचार है, बल्कि सीधे तौर पर हत्या के समान है। क्या यह महज एक अस्पताल है या मुनाफे के लिए मासूमों की बलि चढ़ाने का कोई केंद्र? भाजपा नेता और शिव हर्ष किसान पी.जी. कॉलेज के पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष सचिन सिंह ने इस मामले को प्रमुखता से उठाते हुए अस्पताल प्रबंधन की पोल खोली है। आरोपों के अनुसार:

  • अस्पताल में आर्थिक शोषण के साथ-साथ गंभीर लापरवाही बरती जा रही है।
  • ​डॉ. तारिक हसन के भाई, डॉ. सलमान, जो कि बच्चों के चिकित्सक (पीडियाट्रिशियन) नहीं हैं, उनके द्वारा मासूम बच्चों का इलाज किया जा रहा था।
  • ​इस गलत उपचार के कारण मासूम बच्चों की मौत का मामला भी सामने आया है।

प्रशासनिक जांच और ढिलाई

​पीड़ितों की शिकायत के बाद सीओ सदर ने मामले की जांच की, जिसमें अस्पताल प्रबंधन को दोषी पाया गया। इसके बाद सी.आर.ओ. द्वारा भी मजिस्ट्रेट जांच की गई, जिसमें भी प्रबंधन दोषी पाया गया।सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशासनिक जांच में अस्पताल प्रबंधन को दोषी पाए जाने के बावजूद, केवल एक मामूली जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ कैसे दिया गया? क्या मासूमों की जान की कीमत इतनी ही है? सीओ सदर की जांच में दोषी साबित होने के बाद भी मुख्य चिकित्साधिकारी स्तर पर कार्रवाई का न होना सिस्टम की संवेदनहीनता को दर्शाता है।

​हालाँकि, हैरत की बात यह है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें केवल जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया। मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) स्तर से कोई ठोस कार्रवाई न होने के कारण मामला ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा था।

मंडलायुक्त का दखल और संघर्ष

​सचिन सिंह ने साक्ष्यों के साथ मंडलायुक्त से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी दी। मंडलायुक्त ने संज्ञान लेते हुए ए.डी. हेल्थ और मुख्य चिकित्साधिकारी को दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

​भाजपा नेता ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि:

  • यह मामला मुख्यमंत्री और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक के संज्ञान में भी है।
  • ​यदि अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती है, तो वे मामले को सीधे मुख्यमंत्री के दरबार में ले जाएंगे।
  • ​जब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिल जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

​यह मामला निजी अस्पतालों में व्याप्त संवेदनहीनता और प्रशासनिक शिथिलता की एक बड़ी मिसाल बन चुका है, जिस पर अब सबकी नजरें टिकी हैं।भाजपा नेता सचिन सिंह द्वारा मामले को मंडलायुक्त तक ले जाना और पीड़ितों को न्याय का भरोसा दिलाना एक उम्मीद जगाता है। लेकिन जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई देखना चाहती है।

यदि निजी अस्पताल मानकों का खुला उल्लंघन कर रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना रहेगा, तो आम आदमी किसके भरोसे जिएगा? वक्त आ गया है कि इन ‘कसाईखानों’ को ताला लगे, अन्यथा मासूमों की चीखें व्यवस्था की बुनियाद को हिला देंगी।

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