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बस्ती: स्वास्थ्य सेवाओं का ‘राम नाम सत्य’, ताले में कैद हुआ डेगरहां का आरोग्य मंदिर।

साहब की 'खास कृपा' या बड़ा खेल? डियूटी से गायब सीएचओ की आखिर कौन कर रहा है पैरोकारी?

अजीत मिश्रा (खोजी)

।।भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा डेगरहां का ‘आरोग्य मंदिर’, कागजों में डियूटी कर रही सीएचओ पर एमओआईसी मेहरबान।।

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। सरकार एक ओर जहां सुदूर ग्रामीण इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं जिम्मेदार अधिकारी अपनी जेबें भरने और चहेतों को संरक्षण देने में व्यस्त हैं। ताजा मामला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गौर के अंतर्गत डेगरहां आयुष्मान आरोग्य मंदिर का है, जहां स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर नजर आ रही है।

💫ताले में कैद स्वास्थ्य सेवाएं, जनता बेहाल

ग्रामीणों के लिए उम्मीद का केंद्र कहे जाने वाले इस आरोग्य मंदिर की हकीकत यह है कि यहां अक्सर ताला लटका रहता है। मीडिया टीम की पड़ताल में एक बार नहीं, बल्कि कई बार इस केंद्र के मुख्य द्वार पर ताला जड़ा मिला। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह केंद्र कभी-कभार ही खुलता है, जिससे मरीजों को सामान्य उपचार के लिए भी मीलों दूर भटकना पड़ता है।

💫मैडम की ‘कागजी’ हाजिरी और अफसरों की खामोशी

हैरानी की बात यह है कि यहां तैनात सीएचओ (CHO) अपनी ड्यूटी से लगातार गायब रहती हैं, लेकिन सरकारी अभिलेखों में उनकी उपस्थिति दर्ज हो रही है। सूत्रों की मानें तो ड्यूटी से गायब रहने वाली इस सीएचओ पर गौर एमओआईसी (MOIC) पूरी तरह मेहरबान हैं। सवाल यह उठता है कि क्या बिना उच्चाधिकारियों की मिलीभगत के कोई कर्मचारी महीनों तक ड्यूटी से नदारद रहकर वेतन उठा सकता है?

💫साहब! यह लापरवाही है या भ्रष्टाचार का खेल?

स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की आंखें तब तक नहीं खुलतीं, जब तक कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए। डेगरहां में स्वास्थ्य व्यवस्था के इस चरमराते ढांचे ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। कागजों में डियूटी बजाने वाली सीएचओ पर अब तक कोई कार्यवाही न होना इस बात का प्रमाण है कि जिले के स्वास्थ्य महकमे में ‘ऑल इज नॉट वेल’ है।

“जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और जिम्मेदार अधिकारी लापरवाहों को संरक्षण देने लगें, तो गरीब जनता का भगवान ही मालिक है। डेगरहां की जनता अब शासन से जवाब मांग रही है कि आखिर उन्हें उनके हक का इलाज कब मिलेगा?”

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