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“इटवा में रेत का काला खेल: सोनौली घाट पर नियमों की चिता जला रहा खनन माफिया!”

"प्रशासन की मिलीभगत या मजबूरी? नदी की छाती चीर रहे पंप, सो रहा जिम्मेदार अमला।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

  • ​”सिद्धार्थनगर में ‘सिस्टम’ हुआ ढेर, ठेकेदार की जेब भरने के लिए नदी का कत्ल!”
  • ​”सोनौली बालू घाट: ठेके की आड़ में ‘डकैती’!”
  • ​”खून के आंसू रो रही बूढ़ी राप्ती, माफियाओं के रसूख तले दबा कानून।”
  • ​”इटवा खनन कांड: सड़कों का सत्यानाश, साहबों की जेबें गुलजार!”
  • ​”साहब! ये खनन है या खुला डाका? सोनौली में सरेआम उड़ीं नियमों की धज्जियां।”
  • ​”आखिर किसका संरक्षण? अवैध खनन के शोर में क्यों दबी है अधिकारियों की आवाज़?”

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

✍️विशेष कवरेज: सिद्धार्थनगर के इटवा में खनन माफिया का नंगा नाच!

सिद्धार्थनगर / इटवा।। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और प्रशासन की नाक के नीचे कानून की धज्जियां उड़ने लगें, तो समझ लीजिए कि ‘सिस्टम’ रेत के ढेर पर खड़ा है। सिद्धार्थनगर जिले की इटवा तहसील अंतर्गत सोनौली बालू घाट इन दिनों भ्रष्टाचार और अवैध खनन का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। यहाँ बालू का ठेका तो है, लेकिन खेल नियम-कायदों का नहीं, बल्कि ‘लूट-खसोट’ का चल रहा है।

✍️नदी की छाती चीर रहे पंप: नियमों को ठेंगे पर रखता ‘सोनौली घाट’

सोनौली बालू घाट पर ठेकेदार की दबंगई इस कदर हावी है कि नदी की धारा को भी नहीं बख्शा जा रहा है। सरकारी गाइडलाइंस के मुताबिक नदी के बीच से बालू निकालना अपराध है, लेकिन यहाँ खुलेआम नदी के बीचों-बीच पंप लगाकर बालू खींचा जा रहा है। बालू का यह अवैध ‘हनन’ न केवल नदी के अस्तित्व को संकट में डाल रहा है, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के लिए भी मौत का फरमान साबित हो रहा है।

“क्या प्रशासन अंधा है या जानबूझकर मौन?” – यह सवाल आज इटवा का हर नागरिक पूछ रहा है।

✍️जिम्मेदार अधिकारियों की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरा काला साम्राज्य जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। खनन विभाग और तहसील प्रशासन की खामोशी इस बात की तस्दीक करती है कि ऊपर से नीचे तक ‘सुविधा शुल्क’ का खेल बखूबी खेला जा रहा है। मानकों को ताक पर रखकर दिन-रात भारी मशीनें चल रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल फाइलों में खानापूर्ति होती है।

🔥जर्जर सड़कें और पर्यावरण का विनाश

अवैध खनन का दंश सिर्फ नदी ही नहीं, बल्कि आम जनता भी झेल रही है।

  • सड़कों की दुर्दशा: ओवरलोड भारी वाहनों की निरंतर आवाजाही ने इलाके की सड़कों को गड्ढों में तब्दील कर दिया है।
  • पर्यावरण संकट: अवैध तरीके से बालू निकालने के कारण जलस्तर गिर रहा है और जलीय जीवों पर संकट मंडरा रहा है।

✍️कार्रवाई पर सवालिया निशान

सोनौली घाट पर हो रहे इस तांडव ने सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों की पोल खोल दी है। आखिर किसके संरक्षण में ठेकेदार नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है? क्या जिला प्रशासन इस ‘बालू सिंडिकेट’ पर नकेल कसने की हिम्मत जुटा पाएगा, या फिर सोनौली की नदी इसी तरह माफियाओं की भेंट चढ़ती रहेगी?

प्रशासन और विभाग से सीधे सवाल

  • सरेआम उल्लंघन: क्या खनन विभाग के पास सोनौली घाट पर चल रहे इन “पंपों” की जानकारी नहीं है? अगर है, तो अब तक मशीनें सीज क्यों नहीं की गईं?
  • मिलीभगत का संदेह: स्थानीय लोग खुलेआम मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं; क्या प्रशासन अपनी चुप्पी से इन आरोपों को सही साबित कर रहा है?
  • गाइडलाइंस की धज्जियाँ: एनजीटी (NGT) के स्पष्ट निर्देश हैं कि नदी की धारा के बीच से खनन नहीं होगा। यहाँ नियमों को ठेंगे पर रखने का साहस ठेकेदार को कहाँ से मिल रहा है?
  • राजस्व की हानि: क्या ठेकेदार द्वारा आवंटित सीमा से अधिक बालू निकाला जा रहा है? इसकी पैमाइश आखिरी बार कब हुई थी?

पर्यावरण और जनता से जुड़े सवाल

जर्जर सड़कों का जिम्मेदार कौन: ओवरलोड ट्रकों ने आम जनता की राह मुश्किल कर दी है। सड़कों की मरम्मत का खर्च क्या अवैध खनन की काली कमाई से वसूला जाएगा?

  • जलस्तर का संकट: नदी के बीच से पंपिंग करने के कारण आसपास के गांवों का जलस्तर गिर रहा है; क्या आने वाले सूखे के लिए प्रशासन ठेकेदार को जिम्मेदार ठहराएगा?
  • अवैध वसूली: क्या घाट की आड़ में आसपास के अन्य प्रतिबंधित क्षेत्रों से भी बालू चोरी की जा रही है?

जिम्मेदार अधिकारियों के लिए 

  • कार्यवाही का ढोंग: क्या विभाग केवल छोटे मजदूरों पर कार्यवाही कर बड़े ‘मगरमच्छों’ (ठेकेदारों) को बचाने का काम कर रहा है?
  • जांच की समयसीमा: इस मामले में जांच कमेटी कब बनेगी और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक कब की जाएगी?

इटवा से ब्यूरो रिपोर्ट की कड़ी पड़ताल जारी रहेगी…

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