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बस्ती रजिस्ट्री ऑफिस: जहाँ ‘कलम’ नहीं, दलालों की ‘रकम’ बोलती है! भ्रष्टाचार का ‘विस्सा’: बिना 12 हजार की ‘भेंट’ के नहीं चढ़ती रजिस्ट्री की फाइल।

सफेदपोश डकैती: बस्ती सदर रजिस्ट्री ऑफिस बना दलालों का नया 'मुख्यालय'। साहब नदारद, बाबू मस्त, दलाल जबरदस्त: बस्ती रजिस्ट्री ऑफिस का काला सच।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती का ‘भेंट-तंत्र’: यहाँ जमीन आपकी है, पर रजिस्ट्री दलालों की जागीर! ​अंधेर नगरी, चौपट राजा: बिना रजिस्ट्रार के ‘वसूली एक्सप्रेस’ बना सरकारी दफ्तर।

  • ​सरकारी कुर्सियों पर दलालों का ‘कब्जा’: बाबू सिर्फ नाम के, असली ‘साहब’ तो बिचौलिए हैं!
  • ​ब्यूरो रिपोर्ट का बड़ा खुलासा: शाम ढलते ही रजिस्ट्री ऑफिस में होती है लूट की मलाई का बँटवारा।
  • ​रजिस्ट्रार का पद खाली, दलालों की दिवाली: बस्ती सदर में जारी है रिश्वत का नंगा नाच।

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

विशेष लेख: रजिस्ट्री ऑफिस या ‘वसूली का अड्डा’? जहाँ कलम नहीं, ‘भेंट’ बोलती है!

बस्ती। अगर आप उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जमीन खरीदने या बेचने का सपना देख रहे हैं, तो अपनी जेब में सिर्फ जमीन की कीमत ही नहीं, बल्कि ‘भेंट’ का मोटा चढ़ावा भी साथ रखिएगा। क्योंकि यहाँ की सदर रजिस्ट्री ऑफिस अब सरकारी दफ्तर कम और ‘सफेदपोश डकैतों’ का चारागाह ज्यादा बन गई है। यहाँ नियम-कायदे धूल फांक रहे हैं और दलालों का ‘समानांतर प्रशासन’ चल रहा है।

भेंट के नाम पर ‘लूटतंत्र’: 10 से 12 हजार का फिक्स रेट

हैरानी की बात यह है कि यहाँ ईमानदारी की कोई जगह नहीं है। आपकी जमीन का हिस्सा (विस्सा) कितना भी छोटा क्यों न हो, अगर रजिस्ट्री की चौखट पर पैर रखा है, तो 10,000 से 12,000 रुपये की ‘भेंट’ अनिवार्य है। यह कोई गुप्त बात नहीं, बल्कि खुलेआम चलने वाला ‘गुंडा टैक्स’ है, जिसे बड़े ही सलीके से ‘दस्तावेज लेखकों’ के माध्यम से वसूला जाता है।

कड़वा सच: यहाँ रजिस्ट्री करवाने आए पीड़ितों से अगर अकेले में पूछा जाए, तो वे सिसकते हुए बताते हैं कि बिना ‘सेवा शुल्क’ दिए बाबू की कलम आगे नहीं बढ़ती।

कुर्सियों पर दलालों का कब्जा, वीडियो में कैद हुआ काला सच

सदर रजिस्ट्री ऑफिस का आलम यह है कि यहाँ के बाबू और कर्मचारी अपनी कुर्सियों पर कम, और दलाल उन कुर्सियों पर ज्यादा नजर आते हैं। ऑफिस की मर्यादा को तार-तार करते हुए ये दलाल ही तय करते हैं कि किसकी फाइल ऊपर जाएगी और किसकी दफन होगी। हाल ही में वायरल हुए कुछ वीडियो इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि किस तरह दलाल बेखौफ होकर सरकारी काम में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

अवैध काम का ‘स्पेशल पैकेज’:

  • अगर फाइल में कुछ गड़बड़ है, तो ‘भेंट’ की रकम बढ़ जाती है।
  • तथ्य छुपाने हैं या अवैध कब्जे को वैध दिखाना है? बस दलाल की मुट्ठी गरम कीजिए, काम हो जाएगा।

रजिस्ट्रार का पद खाली: ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’

बस्ती सदर का यह हाल इसलिए भी है क्योंकि यहाँ काफी समय से स्थायी रजिस्ट्रार तैनात ही नहीं है। पद खाली पड़ा है और चार्ज किसी और के पास है। इसी ‘बिना दूल्हे की बारात’ का फायदा यहाँ के बाबू और दलाल उठा रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो कुछ रसूखदार दलाल तो यह भी जुगाड़ लगाते हैं कि यहाँ कोई स्थायी रजिस्ट्रार तैनात ही न हो पाए। वजह साफ है—अगर कोई ईमानदार अफसर आ गया, तो उनकी काली कमाई का शटर गिर जाएगा। फिलहाल, पूरा ऑफिस सिर्फ ‘बाबू तंत्र’ के भरोसे चल रहा है।

शाम होते ही होता है ‘मलाई’ का बंटवारा

दिन भर दस्तावेज लेखकों के जरिए जो ‘भेंट’ वसूली जाती है, उसका हिसाब शाम ढलते ही ऑफिस के भीतर होता है। बाबू से लेकर चपरासी तक, सबके हिस्से की बंदरबांट तय है। सवाल यह उठता है कि आखिर यह भ्रष्टाचार की गंगा कहाँ तक बह रही है? क्या जिला प्रशासन की नाक के नीचे हो रहे इस खेल की खबर ऊपर तक नहीं है? या फिर ‘भेंट’ का हिस्सा ऊपर तक पहुँच रहा है?

तीखे सवाल: प्रशासन कब जागेगा?

  • आखिर क्यों एक आम आदमी को अपनी ही जमीन की रजिस्ट्री कराने के लिए हजारों रुपये की रिश्वत देनी पड़ रही है?
  • रजिस्ट्री ऑफिस में दलालों का प्रवेश वर्जित क्यों नहीं किया जाता?
  • कब तक सरकारी कुर्सियों पर बैठकर दलाल जनता का खून चूसते रहेंगे?
  • क्या शासन बस्ती में एक स्थायी और ईमानदार रजिस्ट्रार की नियुक्ति करने की जहमत उठाएगा?

सावधान रहें! इस भ्रष्टाचार के नेटवर्क का अगला खुलासा जल्द होगा। हम बताएंगे कि भेंट की यह रकम आखिर किन-किन ‘बड़े चेहरों’ की तिजोरियों तक पहुँच रही है।

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