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होली का यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है।

वंदेभारतलाइवटीव न्युज, रविवार 22 2026
*होली पर की आप सभी को हार्दिक बधाई, शुभकामनाऐं *
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====: ; होली का पावन पर्व हर वर्ष चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। होलिका दहन फाल्गुन मास पूर्णिमा को किया जाता है, और होलिका दहन के दूसरे दिन चैत्र मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि पर रंगोत्सव का पर्व मनाया जाता है। होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत और रंगों उमंगों का पर्व है। इस बार फाल्गुन मास पूर्णिमा तिथि दो दिन होने और इस दिन चंद्रग्रहण होने से होलिका दहन और रंगोत्सव की तारीख को लेकर थोड़ी असमंजस की स्थिति भी है। पंचांग गणना के अनुसार होलिका दहन 02 मार्च 2026 को करना शास्त्र सम्मत है, 02 मार्च 2026 शाम को पूर्णिमा तिथि आरंभ हो जायेगी। फाल्गुन मास पूर्णिमा तिथि 02 मार्च 2026 शाम को 05:56 बजे आरंभ हो जायेगी, और इसके दूसरे दिन 03 मार्च को शाम को 05:08 पर पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जायेगी। होलिका दहन फाल्गुन मास पूर्णिमा तिथि पर किया जाता है। ऐसे में होलिका दहन 02 मार्च 2026 को करना उचित है। पूर्णिमा की यह तिथि 03 मार्च 2026 को शाम 05:08 तक रहेगी, परंतु इस समय पर चंद्रग्रहण भी होगा। चंद्रग्रहण 03 मार्च को दोपहर में 03:20 बजे शुरू होगी और शाम 06:47बजे तक ग्रहण रहेगा। रंगोत्सव चैत्र मास कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को मनाया जाता है, जो कि इस बार 04 मार्च 2026 को है। अत: रंगोत्सव का पर्व 04 मार्च को मनाया जायेगा। होली के यह पावन पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व भी है। होली के दिन भक्त प्रह्लाद को भगवान विष्णु ने बचाया था। कथनानुसार भक्त प्रह्लाद विष्णु जी का भक्त था। प्रह्लाद के पिता हिरण्य कश्यप असुर प्रवृति के थे। हिरण्य कश्यप प्रह्लाद को विष्णु की भक्ति करने से रोकता था। परंतु भक्त प्रह्लाद कभी भी भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका से भक्त प्रह्लाद को लेकर जलती हुई आग में बैठने को कहा, होलिका को आग मे नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। किन्तु जब होलिका जब भक्त प्रह्लाद को गोद मे लेकर आग में बैठी तो होलिका स्वयं जल गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित रूप से बच गए। इस दिन से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई। भक्त प्रह्लाद की जीत पर लोगों ने दूसरे दिन आपस में एक दूसरे को रंग लगाते हुए रंगोत्सव मनाया। और तभी से रंगोत्सव का यह पर्व भी मनाया जाने लगा। फाल्गुन मास पूर्णिमा के दिन होलिका दहन से पहले होलिका माई की पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पहले जागकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शाम के समय पर पूजा की थाली सजाकर होलिका दहन स्थल पर जाएं और पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की मुख करके बैठें। होलिका दहन से पूर्व होलिका को गाय के गोबर से बनी हुई उपलों से बनी हुई माला अर्पित करना चाहिए। इसके बाद रोली, अक्षत, फल, पुष्पमाला, हल्दी, गूड़, मूंग, गुलाल, सतनाजा( सात प्रकार के अनाज), अर्पित करते हुए पूजा संपन्न करनी चाहिए। होली रंगों उमंगों का त्योहार है। होली सदियों से मनाया जा रहा एक ऐसा पर्व है जो कि हर जाति वर्ग, उम्र, पीढ़ी के लोगों को आपस में जोड़ने का काम करता है। हर कोई एक साथ मिलजुल कर समूची मानवता के इस पावन त्योहार को एक इकाई के रूप में मनाते हैं, और यही होली का संदेश भी होता है। होली के विभिन्न रंग हमारी भावनाओं और अनुभूतियों के साथ भी जुड़े होते हैं। विविधता में सामंजस्य यह जीवन को जीवंत, उल्लासपूर्ण तथा अधिक रंगीन बना देता है। होली के जैसा ही हमारा जीवन भी रंग-बिरंगा होना चाहिए, बोरियत भरा नहीं। जब हम अपने जीवन में प्रत्येक रंग को स्पष्ट रूप से देखते हैं तो यह जीवन जीवंत हो उठता है। जब सभी रंग एकसाथ मिल जाते हैं तो उससे काला रंग बन जाता है। इसी प्रकार से अपने दैनिक जीवन में भी हम विभिन्न भूमिकाए निभाते हैं। प्रत्येक भूमिका और उससे जुड़ी हुई भावना में भी स्पष्टता होना चाहिए। अज्ञानता में भावनाएं झंझट लगती हैं , जबकि वही ज्ञान में वही भावनाएं हमारे जीवन में रंग भर देती हैं। होलिका दहन का प्रभाव आने वाली ऋतुओं पर पड़ता है। होली का त्योहार सबसे आनंदमय त्योहारों मे से एक है, होली का त्योहार सभी के ह्दय में उल्लास भर देता है।, गलियों मुहल्लों में रंग भर देता है। होली इन खूबसूरत रंगों की मस्ती और उल्लासपूर्ण उत्सव के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा हुआ है, एक ऐसा संदेश जो कि हमारे जीवन को बदलने की शक्ति भी रखता है। होली का यह पर्व रंगों से खेलने का ही नहीं बल्कि हमारे जीवन को सद्गुणों से रंगने के बारे में बताता है। हमारे यहां भारतीय त्योहारों में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता है होली का यह पर्व केवल रोगों से खेलने का ही नही बल्कि अपने अंदर की नकरात्मक शक्ति को भी जलाने और पवित्रता एवं आनंद को जगाने का प्रतीक रूप भी है। होलिका की रात में जब होलिका दहन किया जाता है , जो कि अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक होता है। होलिका दहन की यह प्राचीन परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि अहंकार और अन्याय चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो, सच्ची आस्था, प्रभू के प्रेम के आगे वह एक दिन झुक जाता है नष्ट हो जाता है। होलिका हमारे विकारों का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद सत्यता, पवित्रता, प्रभु प्रेम विश्वास का प्रतीक है। होलिका की अग्नि परमात्मा के ज्ञान की शक्ति है, जो कि आत्मा को शुद्ध करती है विकारों से दूर करती है। होलिका दहन के दूसरे दिन हम रंग लगाने, हंसी उल्लास में मस्त हो जाते हैं, परन्तु इन बाहरी रंगों से भी गहरा एक आध्यात्मिक अर्थ भी है कि परमात्मा हमारी आत्मा को गुणों के रंगों से भी रंगते हैं। होली का यह पर्व केवल एक बाहरी उत्सव ही नहीं बल्कि यह आध्यात्मिक परिवर्तन का भी प्रतीक है सच्ची होली भीतर से खेली जाती है, जहां कि हम अपनी आत्मा को शुद्धता के रंगों से रंगते हैं,अपनी नकारात्मक अंधकारमय परतों को भी जलाते हैं। होली वह है जो हमारे जीवन में सच्ची खुशियां लाए, पवित्रता और एकता लाए। होली केवल एक त्योहार ही नही है बल्कि यह एक खूबसूरत संदेश भी है । एक संदेश जो हमें जागृत होने, शुद्ध होने, अपने जीवन को सच्चे रंगों से भरने के लिए कहता है। रंग गुलाल लगाना जीवन में उत्साह का प्रतीक माना जाता है। इससे सभी में भाईचारा स्थापित होता है। होली के अवसर पर विभिन्न प्रकार के पकवान भी बनाए जाते हैं, जो कि आपस में प्रेम भाईचारे के साथ एक दूसरे को खिलाये भी जाते हैं। कहा जाता है कि होली के इस पावन अवसर पर सभी लोगों को गिले शिकवे दूर करते हुए एक नई शुरुआत करनी चाहिए। और यही होली का उद्देश्य भी है होली पर यदि कुछ बुराइयों पर रोक लगा दिया जाए तो होली के इस पवित्र त्योहार का रंग फीका नहीं पड़ पायेगा। होली पर बुराईयों से दूर रहकर रंग बिरंगी त्योहार का आनंद भी ले सकते हैं।

अनंतपद्मनाभ

D Anant Padamnabh, village- kanhari, Bpo-Gorakhpur, Teh-Pendra Road,Gaurella, Distt- gpm , Chhattisgarh, 495117,
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