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नाम बदलकर मौत का ‘सौदा’: बस्ती में स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से फल-फूल रहा अवैध धंधा!

बस्ती में स्वास्थ्य विभाग पस्त, माफिया मस्त: सील केंद्रों पर दोबारा सज गई अवैध जांच की दुकान

अजीत मिश्रा (खोजी)

नाम बदलकर मनमानी कर रहे धंधेबाज: बस्ती में सील अल्ट्रासाउंड केंद्रों का दोबारा संचालन और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही

ब्यूरो: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • डिग्री एक, सेंटर अनेक: फोटोकॉपी की तरह इस्तेमाल हो रहे डॉक्टरों के प्रमाणपत्र
  • कागजों में सील, जमीन पर चालू: आखिर किसका संरक्षण पा रहे हैं ये अवैध अल्ट्रासाउंड केंद्र?
  • स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा फर्जीवाड़ा, नोटिस की ‘घुट्टी’ पिलाकर सो गए जिम्मेदार
  • अस्पताल के भीतर ‘मरीज माफिया’ का कब्जा, मजबूरी में निजी केंद्रों पर लुट रही जनता
  • बिना डॉक्टर के चल रही जांच: मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे ‘झोलाछाप’ सेंटर संचालक
  • महिला अस्पताल की बदहाली का फायदा उठा रहे दलाल, गर्भवती महिलाएं बन रहीं आसान शिकार
  • 40 किमी दूर सेंटर, जिले में पंजीकरण: स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल और धरातल के बीच का काला खेल

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्वास्थ्य विभाग की साख पर गहरा बट्टा लगा है। जिले में अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर प्रशासन की कार्रवाई महज एक दिखावा साबित हो रही है। ताजा मामले में यह सामने आया है कि जिन केंद्रों को विभाग ने अनियमितताओं के कारण सील किया था, वे अब चोरी-छिपे नाम और जगह बदलकर फिर से मौत का सौदा करने लगे हैं।क्या आप जानते हैं कि जिले में स्वास्थ्य विभाग की ‘सील’ की कीमत क्या है? शायद कुछ भी नहीं! क्योंकि यहाँ के रसूखदार धंधेबाज विभाग द्वारा सील किए गए केंद्रों को कुछ ही दिनों में नाम बदलकर दोबारा खोल लेते हैं और विभाग कुंभकर्णी नींद सोता रहता है।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के पास ही उड़ रही धज्जियां

हैरानी की बात यह है कि सीएमओ कार्यालय के बिल्कुल करीब ही कई ऐसे अल्ट्रासाउंड सेंटर सक्रिय हैं, जिनके पास न तो वैध कागजात हैं और न ही योग्य चिकित्सक। विभागीय नजरों से बचने के लिए इन केंद्रों ने अपने पुराने बोर्ड हटा दिए हैं और नाम बदलकर पैथोलॉजी की आड़ में अल्ट्रासाउंड का अवैध धंधा चला रहे हैं।हैरानी की बात यह है कि जिन केंद्रों को कुछ दिन पहले अवैध संचालन के कारण सील किया गया था, वे अब नए बोर्ड लगाकर फिर से सक्रिय हो गए हैं। कुदरहा और कुसौडा जैसे क्षेत्रों में सील किए गए सेंटर बिना किसी कानूनी खौफ के दोबारा संचालित पाए गए। यह महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि विभाग और माफियाओं के बीच गहरी सांठगांठ का सबूत है। सवाल यह है कि जब सेंटर सील थे, तो वे खुले कैसे? क्या प्रशासन का इकबाल इतना खत्म हो चुका है कि धंधेबाज उसे ठेंगा दिखा रहे हैं?

ग्रामीण अंचलों में फैला माफियाओं का जाल: जिले के विभिन्न क्षेत्रों में स्थिति बेहद गंभीर है:

  • कुदरहा और कुसौरा : इन क्षेत्रों में तीन केंद्रों को पहले सील किया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये केंद्र बिना डॉक्टर के फिर से संचालित पाए गए। कुसौडा में तो सील किए गए केंद्र को नए नाम के साथ दोबारा खोल लिया गया।
  • बनकटी और हर्रैया: बनकटी में एक सेंटर अवैध तरीके से चल रहा है जिसे नोटिस तो दिया गया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हर्रैया के ग्रामीण अंचलों, जैसे मुंडेरवा, रुधौली और सल्टौआ में भी ‘मरीज माफिया’ सक्रिय हैं।
  • डिग्री का फर्जीवाड़ा: सूत्रों के अनुसार, रेडियोलॉजिस्ट की एक ही डिग्री का इस्तेमाल फोटोकॉपी की तरह कई केंद्रों को पंजीकृत करने के लिए किया जा रहा है। कुछ मामलों में तो पंजीकृत सेंटर कहीं और है और संचालन 40 किलोमीटर दूर किसी दूसरे जिले (जैसे गोंडा) में हो रहा है।

सरकारी अस्पतालों में ‘मरीज माफिया’ का कब्जा

सरकारी अस्पतालों में आने वाले गरीब मरीजों को जाल में फंसाने के लिए बिचौलियों का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है। जिला महिला अस्पताल और ओपेक चिकित्सालय में जब अल्ट्रासाउंड मशीनें बंद रहती हैं या लंबी लाइन होती है, तो ये एजेंट सक्रिय हो जाते हैं।सरकारी अस्पतालों—चाहे वह जिला महिला अस्पताल हो या ओपेक चिकित्सालय—में ‘मरीज माफिया’ का मकड़जाल बिछा हुआ है। सरकारी मशीनों के खराब होने या लंबी वेटिंग का फायदा उठाकर ये दलाल डॉक्टरों के चैंबर तक अपनी पहुंच रखते हैं और मजबूर मरीजों को निजी केंद्रों पर धकेल देते हैं। महिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड यूनिट बंद होने के कारण गर्भवती महिलाएं इन अवैध केंद्रों का शिकार बन रही हैं।

  • कमीशन का खेल: प्रत्येक मरीज को निजी सेंटर पर भेजने के लिए इन माफियाओं का कमीशन तय होता है।
  • फर्जी रिपोर्ट: इन केंद्रों पर कोई योग्य डॉक्टर नहीं बैठता। बाहरी और अयोग्य व्यक्ति ही जांच करते हैं और फर्जी तरीके से रिपोर्ट तैयार कर मरीजों की जान जोखिम में डालते हैं।

विभाग की भूमिका पर सवाल

प्रशासनिक सख्ती के नाम पर विभाग केवल ‘नोटिस’ देने तक सीमित है। जब भी कोई बड़ी छापामारी होती है, तो ये केंद्र दो-चार दिन के लिए बंद हो जाते हैं और मामला शांत होते ही फिर से खुल जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल संभव नहीं है।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय से महज कुछ दूरी पर सरेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट जैसे कड़े कानूनों को ये धंधेबाज अपनी जेब में लेकर घूम रहे हैं। आखिर क्यों अधिकारी सिर्फ नोटिस जारी करके खानापूर्ति कर रहे हैं? क्यों इन जालसाजों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई और जेल भेजने की हिम्मत नहीं दिखाई जा रही?सीएमओ डॉ. राजीव निगम का कहना है कि नोटिस जारी किए गए हैं और जांच के लिए नोडल अधिकारियों को मौके पर भेजा जाएगा, लेकिन धरातल पर धंधेबाजों के हौसले बुलंद हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इन अवैध केंद्रों पर बुलडोजर चलाएगा या फिर कागजी कार्रवाई के नाम पर मरीजों की जान से खिलवाड़ जारी रहेगा।

निष्कर्ष: बस्ती में स्वास्थ्य सेवा अब सेवा नहीं, बल्कि ‘अवैध वसूली’ का जरिया बन गई है। अगर जल्द ही इन ‘नाम बदलकर मनमानी’ करने वाले धंधेबाजों और उनके मददगार अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो जनता का सरकारी तंत्र से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। प्रशासन को जागना होगा, इससे पहले कि किसी की ‘फर्जी रिपोर्ट’ किसी की जान ले ले।

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