बस्ती में सरकारी पेड़ों की लूट का ‘महाखेल’: दो प्रधान और लेखपाल पर गिरा गाज!

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में ‘विकास’ के नाम पर ‘विनाश’: सरकारी पेड़ों की लूट का खुला खेल, प्रधान और लेखपाल पर केस दर्ज
- अवैध कटान: नीलामी न सरकारी आदेश, सीधे बेचा ‘सरकारी माल’, अब कानून के शिकंजे में प्रधान
- बस्ती RTO के बाद अब वन माफिया का बोलबाला? ककराखुर्द और हरनहवा में पेड़ों की लूट बेनकाब
बस्ती: जिले के परशुरामपुर विकासखंड में सरकारी संपत्ति को लूटने का एक शर्मनाक और बड़ा खेल उजागर हुआ है। ग्राम पंचायत ककराखुर्द और हरनहवा में सरकारी भूमि पर खड़े लाखों रुपये मूल्य के बेशकीमती पेड़ों को रातों-रात काटकर बेच दिया गया। इस पूरे मामले में नियम-कानूनों को ताक पर रखकर की गई अवैध कटान ने अब प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है।
नीलामी गायब, जेबें गर्म: भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा
आरोप है कि संबंधित ग्राम प्रधानों ने सरकारी खजाने को चूना लगाने की पूरी योजना तैयार की थी। वन विभाग को सूचित करने या नियमानुसार सरकारी नीलामी प्रक्रिया अपनाने के बजाय, प्रधानों ने पेड़ों का सौदा ‘चोर रास्ते’ से कर दिया। सवाल यह है कि आखिर किसकी शह पर सरकारी संपत्ति को निजी जागीर समझकर बेचा गया? क्या लेखपाल की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी अवैध कटान संभव थी?
जांच में खुली पोल, दर्ज हुआ मुकदमा
लगातार मिल रही शिकायतों के बाद हरकत में आए वन विभाग (हर्रैया) ने मामले की जांच शुरू की। प्रारंभिक पड़ताल में ही अनियमितताओं की परतें खुल गईं। वन क्षेत्राधिकारी शारदानंद त्रिपाठी के अनुसार, जांच में अवैध कटान और बिक्री के पुख्ता तथ्य मिले हैं। इसके बाद दोनों ग्राम प्रधानों और संबंधित लेखपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र के भ्रष्ट तंत्र में खलबली मच गई है।
क्या है असली ‘मास्टरमाइंड’?
केवल प्रधान और लेखपाल ही नहीं, बल्कि इस रैकेट में शामिल अन्य संभावित चेहरों की पहचान करना अब जरूरी हो गया है। क्या यह खेल केवल दो गांवों तक सीमित है या जिले के अन्य हिस्सों में भी सरकारी संपत्तियों पर इसी तरह ‘आरा’ चल रहा है?
प्रशासन से मांग: सिर्फ मुकदमा काफी नहीं, वसूली भी हो
क्षेत्र की जनता और जागरूक नागरिकों का कहना है कि सिर्फ मुकदमा दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं है। दोषियों से सरकारी नुकसान की भरपाई कराई जाए और इस पूरे मामले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच हो। यदि इस लूट में कोई बड़ा रसूखदार शामिल है, तो उसे भी बेनकाब किया जाए।
‘सरकारी खजाने पर डाका, कब तक चलेगा?’
जिले में यह पहली बार नहीं है जब सरकारी संपत्ति को निशाना बनाया गया है। लेकिन इस बार वन विभाग की त्वरित कार्रवाई ने एक उम्मीद जगाई है। अब देखना यह है कि क्या यह मामला केवल फाइल में दबकर रह जाएगा या दोषियों को उनके किए की सजा मिलकर रहेगी? प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या सरकारी संपत्तियां केवल लूटने के लिए हैं?
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