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बस्ती में ‘हरियाली का कत्ल’: रक्षक ही बने भक्षक, सागौन के 160 पेड़ों का सामूहिक नरसंहार!

अजगवा जंगल का चीरहरण: वन विभाग की मिलीभगत से माफियाओं ने मचाया तांडव!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में ‘हरियाली का कत्ल’: जंगल के रक्षक ही बने भक्षक, सागौन के 160 पेड़ों का सामूहिक नरसंहार!

ब्यूरो, बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • बस्ती में जंगलराज: वन विभाग की ‘आंखों के सामने’ उजड़ गया अजगवा का सागौन!
  • लाखों के लालच में ‘नंगा’ हुआ जंगल: जेसबी से जड़ें उखाड़ रहे माफिया, अफसर बेखबर!
  • पर्यावरण की बलि, जेबें गरम: बस्ती में सागौन माफियाओं का खुला खेल!

​बस्ती जिले की फिजाओं में घुली हरियाली अब दम तोड़ रही है। रामनगर वन रेंज के अंतर्गत आने वाले गौर थाना क्षेत्र का ‘अजगवा जंगल’, जो कभी शुद्ध हवा और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक हुआ करता था, आज वन माफियाओं की कुल्हाड़ियों के नीचे कराह रहा है। यहाँ सागौन के करीब 160 कीमती पेड़ों का जिस बेरहमी से सामूहिक नरसंहार किया गया है, उसने न केवल पर्यावरण को गहरी चोट पहुँचाई है, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर और शर्मनाक सवाल खड़े कर दिए हैं।

सागौन का ‘नरसंहार’, और महकमा बना तमाशबीन!

​सूत्रों की मानें तो अजगवा जंगल में वन माफियाओं का ‘खुला जंगलराज’ चल रहा है। प्रतिबंधित सागौन के पेड़ों पर बिना किसी परमिट के लगातार आरी चलती रही, और वन विभाग के तथाकथित जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद सोते रहे। यह महज पेड़ों की कटाई नहीं है, यह सरकारी संरक्षण में पर्यावरण की सुनियोजित हत्या है। लाखों रुपयों के खेल में हरियाली को बाजार में बेचने का सीधा आरोप वन विभाग के स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत पर लग रहा है।

जड़ें तक उखाड़ने की जुर्रत: आखिर किसका है वरदहस्त?

​हैरत की बात तो यह है कि माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि केवल पेड़ ही नहीं काटे गए, बल्कि सबूत मिटाने की नियत से अब जेसीबी मशीनों का इस्तेमाल कर पेड़ों की जड़ें तक उखाड़ी जा रही हैं। जंगल को बचाने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर थी, वे स्वयं ही जंगल को निगलने में जुटे नजर आ रहे हैं। क्या बिना विभाग की मिलीभगत के इतनी बड़ी संख्या में सागौन के पेड़ कटना और फिर उन्हें वहां से उठा ले जाना संभव है? यह सवाल आज हर बस्तीवासी के जेहन में है।

जिले के रामनगर वन रेंज और गौर थाना क्षेत्र के अंतर्गत अर्जुनवीर-अजगेवा जंगल में हरियाली पर ‘कुल्हाड़ी’ का पहरा है। यहां प्रतिबंधित सागौन के 150 से अधिक पेड़ों की अवैध कटान ने वन विभाग के दावों और कार्यप्रणाली की कलई खोलकर रख दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कौन सी अदृश्य शक्ति है जो वन माफियाओं को कानून की पहुंच से दूर रखे हुए है?

‘मास्टरमाइंड’ को बचाने का खेल?

सूत्रों की मानें तो इस पूरे अवैध कारोबार का मास्टरमाइंड वीरेंद्र चौधरी है। चश्मदीदों के अनुसार, जब पेड़ों की कटान हो रही थी, तब वीरेंद्र चौधरी स्वयं मौके पर मौजूद था। बावजूद इसके, रेंज केस संख्या 09/2026-2027 में दर्ज प्राथमिकी (FIR) में उसका नाम गायब है। विभाग ने केवल महावीर चौधरी, अतुल सिंह और सूरज सिंह को नामजद कर खानापूर्ति कर दी है।

संदेह के घेरे में वन रेंज अधिकारी

वन विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रेंजर सोनल वर्मा पर माफिया को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि वीरेंद्र चौधरी पर हाल ही में एक और पेड़ कटान का मामला दर्ज हुआ था, फिर भी वह बेखौफ घूम रहा है। रसूख के आगे वन विभाग का मौन यह साबित करता है कि माफिया और अफसरों की यह सांठगांठ जिले की हरियाली को निगलने पर आमादा है।

क्या रसूखदार कानून से ऊपर है?

एक के बाद एक घटनाओं के बाद भी मुख्य आरोपी का नाम एफआईआर से बाहर रहना, वन विभाग की मिलीभगत की ओर सीधा इशारा है। यदि समय रहते वन विभाग ने अपना चरित्र नहीं सुधारा, तो जल्द ही अर्जुनवीर-अजगेवा का घना जंगल केवल फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा। सवाल अब यह है कि क्या वन विभाग के उच्चाधिकारी इस मामले की निष्पक्ष जांच कर असल मास्टरमाइंड को बेनकाब करेंगे या यह जांच भी माफिया की फाइलों में दब जाएगी?

सिस्टम कठघरे में, चुप्पी बनी बड़ा सवाल

​पर्यावरण संरक्षण का ढिंढोरा पीटने वाले वन विभाग की इस मामले में चुप्पी उसकी संलिप्तता की ओर इशारा कर रही है। कानून की धज्जियां उड़ाते हुए जब माफिया खुलेआम जंगल का सफाया कर रहे थे, तब विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे क्यों बैठे थे? क्या यह ‘लाखों का खेल’ अफसरों की जेबों तक पहुँचा है?

​अजगवा जंगल का उजड़ना महज एक घटना नहीं है, बल्कि यह उस भ्रष्ट सिस्टम का चेहरा है, जहां जंगल के रक्षक ही भक्षक बन गए हैं। यदि शासन-प्रशासन ने इस मामले में कठोर कार्रवाई करते हुए लिप्त अधिकारियों और माफियाओं को बेनकाब नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ी बस्ती के जंगलों को केवल किताबों की तस्वीरों में ही देख पाएगी।

सवाल अब यह नहीं कि पेड़ क्यों कटे, सवाल यह है कि इस ‘हरियाली के कत्ल’ के पीछे किसका हाथ है और कब तक यह ‘जंगलराज’ चलता रहेगा?

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