
अयोध्या में ‘रेलवे की तानाशाही’: ग्रामीणों की जीवनरेखा काटी, जान जोखिम में डालने को मजबूर जनता
अयोध्या में रेलवे की 'तानाशाही': ग्रामीणों की जीवनरेखा काटी, खौफ के साये में जीने को मजबूर जनता! विकास के नाम पर 'वध': अयोध्या में रेलवे की लापरवाही ने छीनी ग्रामीणों की बुनियादी सुविधाएं!
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: विकास या विनाश? अयोध्या में रेलवे की ‘तानाशाही’ ने छीनी ग्रामीणों की सांसें
- क्या रेलवे को है जनहित की परवाह? सरायरासी-सनेथू में बिना विकल्प रास्ता बंद करना ‘प्रशासनिक अपराध’!
- रेलवे के ‘तुगलकी फरमान’ से दहला अयोध्या: ग्रामीणों की चेतावनी—सुध लो, वरना होगा बड़ा जन-आंदोलन!
- रेलवे की मनमानी से हजारों की जिंदगी दांव पर, कब जागेगा रेल मंत्रालय?
- सरायरासी-सनेथू का ‘बंद रास्ता’: क्या विकास की गाड़ी जनता को कुचलकर आगे बढ़ेगी?
- अंधेरे में ग्रामीण, दफ्तरों में अफसर! रेलवे की लापरवाही से अयोध्या में मचा हाहाकार।
अयोध्या।। धार्मिक नगरी अयोध्या में विकास की गंगा बहने के दावे हर रोज किए जाते हैं, लेकिन सरायरासी-सनेथू संपर्क मार्ग की बदहाली इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। रेलवे विभाग की एकतरफा और अमानवीय कार्यशैली ने हजारों ग्रामीणों को उनके ही घर में ‘कैदी’ बना दिया है। बिना किसी पूर्व सूचना और वैकल्पिक व्यवस्था के दशकों पुराने मुख्य रास्ते को बंद कर रेलवे ने जो ‘अराजकता’ फैलाई है, उसने न केवल आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि विभाग की संवेदनहीनता को भी उजागर किया है।एक तरफ अयोध्या वैश्विक पटल पर विकास के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है, तो दूसरी तरफ धर्मनगरी के सरायरासी-सनेथू इलाके में रेलवे विभाग की ‘अंधेरगर्दी’ ने हजारों ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है। रेलवे ने बिना किसी पूर्व सूचना और वैकल्पिक व्यवस्था के दशकों पुराने मुख्य मार्ग को अचानक बंद कर तानाशाही का परिचय दिया है। अब सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब जनता के पैरों से जमीन और आवागमन का हक छीनना है?
जान जोखिम में, विकास दूर की कौड़ी
यह संपर्क मार्ग केवल कंक्रीट की सड़क नहीं था, बल्कि सरायरासी और सनेथू समेत आसपास के दर्जनों गांवों के लिए एक ‘लाइफलाइन’ (जीवनरेखा) थी। रेलवे ने जिस बेरहमी से इस रास्ते को सील किया है, उसका खामियाजा अब समाज के सबसे कमजोर वर्गों को भुगतना पड़ रहा है।यह रास्ता महज एक पगडंडी नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जीवनरेखा थी। इसी मार्ग से किसान अपनी फसल लेकर मंडी जाते थे, नौनिहाल अपने भविष्य को संवारने स्कूल पहुँचते थे और मरीज समय पर अस्पताल। लेकिन, रेलवे के तुगलकी फरमान ने इस पूरे तंत्र को ठप कर दिया है। आज बुजुर्गों, महिलाओं और स्कूली बच्चों को जान हथेली पर रखकर लंबा और जोखिम भरा सफर तय करना पड़ रहा है।
- किसानों पर मार: मंडी तक फसल ले जाने का रास्ता बंद होने से किसानों का परिवहन खर्च दोगुना हो गया है। समय पर मंडी न पहुँच पाने के कारण फसलें खराब हो रही हैं।
- स्कूली बच्चों का भविष्य अधर में: छोटे-छोटे बच्चे जो स्कूल के लिए इस रास्ते का उपयोग करते थे, अब उन्हें कई किलोमीटर का अतिरिक्त सफर तय करना पड़ रहा है। सुबह-सुबह बच्चों की यह दौड़ न केवल उनकी ऊर्जा को खत्म कर रही है, बल्कि उन्हें सड़क हादसों के खतरे में भी डाल रही है।
- मरीजों की जान से खिलवाड़: किसी इमरजेंसी में एम्बुलेंस का समय पर न पहुँच पाना अब एक बड़ी त्रासदी को आमंत्रण देने जैसा है। रास्ते बंद होने से मरीजों को अस्पताल पहुँचाना किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है।
प्रशासनिक लापरवाही: ‘क्या जनता की जान की कोई कीमत नहीं?’
रेलवे के इस कदम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा के नाम पर रास्ता बंद करना समझ में आता है, लेकिन ‘सुरक्षा के नाम पर मुसीबत’ खड़ी करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। यदि यह मार्ग खतरनाक था, तो रेलवे ने वैकल्पिक अंडरपास, ओवरब्रिज या कम से कम गेट-मित्र की तैनाती क्यों नहीं की?
रेलवे का यह कदम न केवल जनविरोधी है, बल्कि पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना है। किसी भी निर्माण या सुरक्षा प्रोटोकॉल के नाम पर रास्ता बंद करना गलत नहीं, लेकिन बिना विकल्प दिए रास्ता सील करना सीधा-सीधा प्रशासनिक अपराध है। क्या रेलवे के आला अधिकारियों को नहीं पता कि इस मार्ग के बंद होने से किसानों की रोजी-रोटी और बीमारों की जान पर बन आई है?ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें अंधेरे में रखकर यह कदम उठाया गया। क्या अयोध्या जैसे महत्वपूर्ण शहर में रेलवे विभाग मनमाने तरीके से काम करने के लिए स्वतंत्र है? स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और रेलवे के आला अधिकारियों का ‘कठोर रवैया’ जनता के गुस्से को और अधिक भड़का रहा है।

’आर-पार’ की चेतावनी
ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। भारत सरकार के रेल मंत्री को भेजे गए पत्र में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है:
”विकास के नाम पर बुनियादी सुविधाएं छीनना हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि जल्द ही अंडरपास या फाटक की व्यवस्था नहीं की गई, तो अयोध्या की सड़कों पर बड़ा जन-आंदोलन होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी रेलवे प्रशासन की होगी।”
अंतिम चेतावनी: सुध ले रेल मंत्रालय
यह मामला केवल सरायरासी-सनेथू का नहीं है, यह उस हर उस व्यक्ति का अपमान है जो सरकारी तंत्र से थोड़ी सी संवेदनशीलता की उम्मीद करता है। अयोध्या में चल रहे विकास कार्यों के शोर में कहीं इन ग्रामीणों की सिसकियाँ दब न जाएं, यह सुनिश्चित करना रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी है।
अगर समय रहते रेलवे विभाग ने अपने ‘तुगलकी फरमान’ को वापस नहीं लिया या वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की, तो यह ‘विकास’ आने वाले दिनों में जनता के आक्रोश की आग में जलने को मजबूर होगा।ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे चुका है। रेल मंत्री को भेजे गए पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई है—या तो तत्काल अंडरपास, रेलवे फाटक या गेट-मित्र की व्यवस्था करें, वरना अयोध्या की धरती पर बड़ा जन-आंदोलन होगा।
रेलवे विभाग कान में तेल डालकर बैठा है, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि यह ‘राम की नगरी’ है, जहाँ जनता की आवाज को दबाना सत्ता के गलियारों के लिए भारी पड़ सकता है। विकास की रेलगाड़ी अगर जनता को कुचलकर चलेगी, तो जनता उसे रोकना भी जानती है।
अब गेंद रेल मंत्रालय के पाले में है। क्या वे इस प्रशासनिक अराजकता को खत्म करेंगे या फिर हजारों ग्रामीणों को ऐसे ही घुट-घुट कर जीने के लिए मजबूर किया जाएगा?
क्या रेलवे विभाग अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा, या ग्रामीणों को अपना हक छीनने के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर करेगा? समय अब बीत चुका है, अब कार्रवाई का वक्त है।
















