
शिकायत बंद… समस्या बरकरार: कब बदलेगी जनसुनवाई की कार्यप्रणाली?
'केस क्लोज' से आगे की हकीकत: क्या सच में हल हुई जनता की परेशानी? जनसुनवाई या केवल सांख्यिकी का खेल? समाधान की तलाश में भटकता आम आदमी।
अजीत मिश्रा (खोजी)
शिकायत बंद… पर क्या समस्या खत्म हुई? समाधान की तलाश में भटकता आम आदमी
- क्या पोर्टल पर ‘ग्रीन टिक’ लगना ही वास्तविक समाधान है?
- जांच उसी विभाग को क्यों, जिसकी शिकायत की गई? जवाबदेही का सवाल।
- शिकायतकर्ता की संतुष्टि क्यों नहीं है जनसुनवाई का आधार?
- सुशासन की राह: जब तक शिकायतकर्ता न कहे ‘ओके’, तब तक बंद न हो शिकायत।
- डिजिटल जनसुनवाई में बदलाव की मांग: फीडबैक बने समाधान का असली पैमाना।
- केवल ‘केस क्लोज’ का स्टेटस नहीं, जनता को चाहिए वास्तविक समाधान।
आज के डिजिटल युग में उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन करने की होड़ मची है। ‘जनसुनवाई’ (IGRS) पोर्टल जैसी व्यवस्थाएं इसी दिशा में एक बड़ा कदम हैं। इनका मूल उद्देश्य जनता को घर बैठे त्वरित न्याय और समस्याओं का समाधान दिलाना था। फाइलों के बोझ और दफ्तरों के चक्कर से मुक्ति दिलाने का यह सपना कागजों पर तो बहुत सुंदर दिखता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आज आम आदमी के मन में एक बड़ा सवाल बार-बार कौंध रहा है—शिकायत तो ‘क्लोज’ हो गई, लेकिन क्या उसकी समस्या भी खत्म हुई?
व्यवस्था का अंतर्विरोध
इस पूरी प्रक्रिया में एक तकनीकी और नैतिक खामी स्पष्ट दिखाई देती है। जब कोई नागरिक किसी विभाग या अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या लापरवाही की शिकायत करता है, तो जांच की जिम्मेदारी अक्सर उसी विभाग के अधीन अधिकारियों को सौंप दी जाती है। यह ‘रक्षक के ही भक्षक होने’ जैसी स्थिति है। क्या निष्पक्ष जांच की उम्मीद उन लोगों से की जा सकती है जो खुद उस व्यवस्था का हिस्सा हैं?
’केस क्लोज’ की जल्दबाजी
IGRS पोर्टल पर शिकायतों के निस्तारण का जो पैमाना तय किया गया है, वह अक्सर ‘समाधान’ पर नहीं, बल्कि ‘संख्या’ पर आधारित होता है। अधिकारी को अपनी रिपोर्ट फाइल बंद करनी है, क्योंकि समय सीमा (Deadline) का दबाव है। नतीजा यह होता है कि बिना शिकायतकर्ता से पूछे, बिना उसकी संतुष्टि परखे, केस को ‘निस्तारित’ (Disposed) मान लिया जाता है। पोर्टल पर ‘ग्रीन टिक’ लग जाता है, लेकिन शिकायतकर्ता की समस्या जस की तस बनी रहती है।
समाधान की दिशा में ठोस सुझाव
अगर सरकार वास्तव में ‘सुशासन’ चाहती है, तो उसे अपनी कार्यप्रणाली में कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे:
- फीडबैक अनिवार्य हो: किसी भी शिकायत को तब तक ‘अंतिम निस्तारण’ न माना जाए जब तक कि शिकायतकर्ता स्वयं पोर्टल या कॉल के माध्यम से अपनी संतुष्टि दर्ज न करे।
- स्वतंत्र समीक्षा: यदि नागरिक संतुष्ट नहीं है, तो उसे स्वतः ही एक स्वतंत्र या वरिष्ठ अधिकारी के स्तर पर अपील का अधिकार मिलना चाहिए। शिकायतों की जांच का जिम्मा हमेशा उसी विभाग पर नहीं होना चाहिए जिसकी शिकायत की गई है।
- जवाबदेही का निर्धारण: यदि किसी अधिकारी के खिलाफ एक ही समस्या की बार-बार शिकायतें आ रही हैं, तो यह सीधे तौर पर उनकी कार्यकुशलता और मंशा पर प्रश्न खड़ा करता है। ऐसे में संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
निष्कर्ष
जनता को केवल एक शिकायत नंबर (Ref No.) या ‘केस क्लोज’ का स्टेटस नहीं चाहिए। प्रशासनिक मशीनरी को यह समझना होगा कि प्रौद्योगिकी का अर्थ केवल फाइलों को डिजिटल करना नहीं है, बल्कि जनता के प्रति संवेदनशीलता को डिजिटल बनाना है।
व्यवस्था का असली पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितनी शिकायतें बंद की गईं, बल्कि यह होना चाहिए कि कितनी समस्याओं का वास्तविक और स्थायी समाधान निकला। जब तक शिकायतकर्ता की मुस्कान और संतुष्टि अंतिम उद्देश्य नहीं होगी, तब तक ‘जनसुनवाई’ केवल एक तकनीकी प्रक्रिया बनकर रह जाएगी।
क्या आपको लगता है कि जनसुनवाई पोर्टल के फीडबैक सिस्टम को पूरी तरह से विकेंद्रीकृत करके उसे सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय या किसी स्वतंत्र लोकपाल के अधीन किया जाना चाहिए?




















