
‘धरने’ के 350 दिन पूरे: क्या बहरा हो गया है प्रशासन, या सरकार को दिख नहीं रही बर्बादी?
बस्ती चीनी मिल की नीलामी या खुली लूट? प्रशासन की खामोशी पर उठे सवाल 350 दिन से सड़कों पर 'चीख' रहे लोग, पर सरकारी तंत्र के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘धरने’ के 350 दिन: क्या प्रशासन बहरा और सरकार गूंगी हो गई है?
- मिल की ईंट-चौखट तक उखाड़ ले गए, पर प्रशासन बना रहा मूकदर्शक: अब ‘तो’ जाग जाओ!
- अन्नदाताओं और श्रमिकों की बदहाली का जिम्मेदार कौन? प्रशासन-प्रबंधन की मिलीभगत का काला सच
बस्ती: लोकतंत्र में जनता की आवाज को ‘नीति’ और ‘न्याय’ का आधार माना जाता है, लेकिन बस्ती की चीनी मिल वाल्टरगंज के मामले में यह धारणा खोखली साबित हो रही है। वाल्टरगंज चीनी मिल के प्रभावित मौसमी कर्मचारी, किसान और व्यापारी आज अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए सड़क पर 350 दिन पूरे कर चुके हैं। 350 दिनों का लंबा संघर्ष, फिर भी न प्रशासन की नींद टूटी है और न ही सरकार के कानों पर जूं रेंग रही है।
अन्नदाताओं और श्रमिकों के साथ क्रूर मजाक
350 दिनों से ये लोग रोजी-रोटी छीन जाने के कारण भूखमरी की कगार पर हैं। मौसमी कर्मचारी बेरोजगार हैं, किसानों का गन्ना भुगतान वर्षों से लटका हुआ है, और व्यापारियों का धंधा चौपट हो चुका है। क्या डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित ‘श्रम के सम्मान’ की नींव बस्ती में दफन हो गई है?
नीलामी या ‘सरकारी संरक्षण में लूट’?
चीनी मिल की नीलामी में हुआ घपला इस पूरे प्रकरण का सबसे काला अध्याय है। नीलामी की समय सीमा समाप्त होने के बावजूद, मिल की संपत्तियों को चोरी-छिपे निकाला जा रहा है। हालत यह है कि अनैतिकता की सारी हदें पार करते हुए मिल की बिल्डिंग की ईंटें, चौखटें और बाजू तक उखाड़कर ले जाए जा रहे हैं। यह नीलामी है या प्रशासन की मिलीभगत से चल रही लूट?
प्रशासन और प्रबंधन की ‘मिलीभगत’ का खेल
आरोप है कि मिल प्रबंधन और जिला प्रशासन के बीच एक गहरी सांठगांठ है। एक ही मालिक और एक ही प्रबंधन तंत्र के दोहरे मापदंडों ने कानून को ताक पर रख दिया है। प्रशासन ने मानो अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है और तमाशा देख रहा है।
हमारी मांगें: अब चुप रहना अपराध है
समय आ गया है कि इस भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो:
- उच्च स्तरीय जांच: 350 दिनों के इस धरने का संज्ञान लेकर तत्काल प्रभाव से उच्च स्तरीय जांच बिठाई जाए।
- घपले की जवाबदेही: नीलामी में हुए घपले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर मुकदमा दर्ज किया जाए।
- भुगतान और रोजगार: मौसमी कर्मचारियों को बकाया भुगतान और रोजगार दिलाया जाए, तथा किसानों का गन्ना मूल्य भुगतान अविलंब हो।
- मिल की संपत्ति सुरक्षित हो: मिल की शेष बची संपत्ति को लूटने से रोका जाए और उस पर तुरंत सील लगाई जाए।
यदि जिला प्रशासन और प्रबंधन इस घपले पर स्पष्टीकरण नहीं दे सकते, तो नैतिक आधार पर उन सभी अधिकारियों और कथित दलालों की भूमिका की जांच कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। 350 दिन बहुत होते हैं, अब ‘तो’ जाग जाओ!




















