उत्तर प्रदेशआगराआजमगढ़इटावाइतवाकानपुरकानपूरकुशीनगरगोंडागोरखपुरजौनपुरप्रयागराजबस्तीबहराइचबाराबंकीलखनऊसिद्धार्थनगर 

खाकी का ‘कवर फायर’: स्पा पर छापा तो महज दिखावा, असली मगरमच्छों पर मेहरबानी क्यों?

हफ्ता वसूली या फर्ज से गद्दारी? सफेदपोशों की गोद में बैठी बस्ती पुलिस!

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। खाकी की ‘खामोशी’ या धंधेबाजों से ‘दोस्ती’? आखिर कब तक पर्दे में रहेंगे संदिग्ध होटल।।

विशेष संपादकीय

​बस्ती शहर में पिछले दिनों स्पा सेंटरों पर हुई छापेमारी ने जिस सच से पर्दा उठाया है, वह चौंकाने वाला कम और शर्मनाक ज्यादा है। गोरखपुर, प्रयागराज और कानपुर तक की महिलाओं का यहाँ पकड़ा जाना यह साबित करता है कि जिले में अनैतिक देह व्यापार का जाल कितनी गहराई तक फैल चुका है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल ‘स्पा’ का नहीं, बल्कि उन ‘संदिग्ध होटलों’ का है जिन पर पुलिस की मेहरबानी आज भी बरकरार है।

​रसूखदारों का संरक्षण और पुलिस की ‘चुप्पी’

​अखबार की रिपोर्ट खुद गवाही दे रही है कि शहर के पॉश इलाकों, मालवीय रोड, रोडवेज और जिगिना मार्ग जैसे व्यस्त क्षेत्रों में खुलेआम चेहरे ढकी महिलाओं और संदिग्ध लोगों का आना-जाना लगा रहता है। ताज्जुब की बात यह है कि यह सब पुलिस की जानकारी में होने के बावजूद ‘पर्दे’ के पीछे है। क्या यह माना जाए कि इन होटलों के मालिकों के हाथ ‘सफेदपोश’ नेताओं और विभाग के ऊंचे अधिकारियों तक पहुंचते हैं?

​खानापूर्ति वाली कार्रवाई?

​हर्रैया के एक होटल में ग्राम प्रधान का मास्टरमाइंड निकलना और उसे ‘सफेदपोशों’ का संरक्षण मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि यह धंधा बिना सरकारी शह के संभव नहीं है। जब भी दबाव बढ़ता है, पुलिस एक-दो स्पा सेंटरों पर छापेमारी कर अपनी पीठ थपथपा लेती है, लेकिन उन बड़े होटलों की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखती जहाँ महीनों से यह गंदा खेल जारी है।

​क्या पुलिस को भनक तक नहीं?

​रिपोर्ट कहती है कि मड़वानगर में साल भर से किराए के मकान में धंधा चल रहा था और पुलिस को भनक तक नहीं थी। क्या हमारी खुफिया एजेंसियां इतनी लाचार हैं, या फिर ‘सुविधा शुल्क’ के बदले आंखों पर पट्टी बांध ली गई है? नौकरियों का लालच देकर मजबूर महिलाओं को इस दलदल में धकेलने वाले गिरोह के असली सरगना आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।

बस्ती शहर में जो कुछ हो रहा है, उसे ‘अनैतिक धंधा’ कहना छोटी बात होगी—यह दरअसल कानून के इकबाल का कत्ल है। सीओ सिटी सत्येंद्र भूषण त्रिपाठी और एसपी श्यामकांत की टीम ने स्पा सेंटरों पर छापा मारकर 14 महिलाओं को पकड़कर वाहवाही तो बटोर ली, लेकिन असली सवाल अब भी शहर की आबोहवा में जहर घोल रहा है: उन ‘सफेदपोशों’ और ‘संदिग्ध होटलों’ का क्या, जिनके नाम पुलिस की फाइलों में तो दर्ज हैं लेकिन उन पर हाथ डालने में खाकी के पसीने छूट रहे हैं?

मालवीय रोड से रोडवेज तक: ‘वर्दी’ की सरपरस्ती में सजता बाजार?

रिपोर्ट के मुताबिक मालवीय रोड, रोडवेज बस स्टेशन, जिगिना मार्ग और पटेल चौक से हंडिया चौराहे के बीच आधा दर्जन से ज्यादा होटल खुलेआम देह व्यापार के अड्डे बने हुए हैं। स्थानीय लोग जानते हैं, दलाल जानते हैं, और शौकीन भी जानते हैं—तो क्या केवल ‘पुलिस’ ही अंधी और बहरी बनी हुई है? मोबाइल नेटवर्क के जरिए चल रहे इस संगठित अपराध की भनक अगर कप्तान को नहीं है, तो यह खुफिया तंत्र की नाकामी है, और अगर भनक होकर भी कार्रवाई नहीं हो रही, तो यह ‘हफ्ता वसूली’ का सीधा सबूत है।

हर्रैया का ‘प्रधान’ और खाकी का ‘मान’

हर्रैया में नवंबर 2025 में हुए खुलासे ने साफ कर दिया था कि इस खेल में ग्राम प्रधान जैसे लोग शामिल हैं जिन्हें ‘सफेदपोशों’ का वरदहस्त प्राप्त है। जब मास्टरमाइंड पुलिस की फाइलों में ‘चिह्नित’ हैं, तो फिर उन्हें गिरफ्तार करने के बजाय ‘निगरानी’ का झुनझुना क्यों बजाया जा रहा है? क्या पुलिस इन होटलों के मालिकों के नाम सार्वजनिक करने से इसलिए डर रही है क्योंकि उनमें से कई खुद सत्ता के गलियारों में बैठते हैं?

मजबूरियों का व्यापार और पुलिस की ‘मौन’ सहमति

शहर के बीचों-बीच गरीब, विधवा और तलाकशुदा महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। मड़वानगर में साल भर तक किराए के मकान में सेक्स रैकेट चलता रहा और कोतवाली पुलिस सोती रही। यह ‘सोना’ स्वाभाविक नहीं था, यह ‘सुविधा शुल्क’ की गहरी नींद थी।

जनता पूछती है कड़े सवाल:

सत्येंद्र भूषण त्रिपाठी (सीओ सिटी) जी, ‘कुंडली खंगालने’ का दावा कब कार्रवाई में बदलेगा? क्या यह जांच केवल छोटे प्यादों तक सीमित रहेगी या उन ‘बड़े मगरमच्छों’ के गिरेबान तक भी पहुँचेगी जो इन होटलों के असली मालिक हैं?

क्या उन पुलिसकर्मियों पर गाज गिरेगी जिनकी बीट में ये संदिग्ध होटल सालों से फल-फूल रहे हैं?

क्या प्रशासन में इतनी हिम्मत है कि इन ‘सफेदपोशों’ के चेहरे से नकाब हटाकर उन्हें सलाखों के पीछे भेजे?

​जनता की मांग: अब आर-पार की जंग हो

​शहर की गरिमा और भविष्य की सुरक्षा के लिए अब केवल ‘जांच’ और ‘निगरानी’ के आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। पुलिस प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि:

  • ​वे कौन से ‘सफेदपोश’ हैं जो इन धंधेबाजों को बचा रहे हैं?
  • ​संदिग्ध होटलों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
  • ​क्या अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी जिनके इलाकों में साल भर से यह व्यापार फल-फूल रहा था?

​अगर समय रहते इन होटलों पर बुलडोजर नहीं चला और खाकी के भीतर छिपे ‘भेदियों’ पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि कानून के रक्षक ही इस अपराध के सबसे बड़े मददगार हैं।

Back to top button
error: Content is protected !!