
स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल: क्या ‘पीड़ित’ को न्याय पाने के लिए भी ‘रिश्तेदारी’ का सर्टिफिकेट चाहिए?
क्या मरीज के 'रिश्ते' तय करेंगे इलाज में लापरवाही की शिकायत का अधिकार?बस्ती में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल: इलाज में लापरवाही की शिकायत के लिए भी अब 'रिश्तेदारी का सर्टिफिकेट' अनिवार्य?
स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल: क्या ‘पीड़ित’ को न्याय पाने के लिए भी ‘रिश्तेदारी’ का सर्टिफिकेट चाहिए?
- ‘नवयुग मेडिकल सेंटर’ विवाद: शिकायत करने वाले की पात्रता पर अस्पताल प्रबंधन का कड़ा रुख, जानें क्या है पूरा मामला
- लापरवाही की शिकायत पर डॉक्टरों का तीखा पलटवार: “ऐसी विधिकविहीन शिकायतों से सड़क दुर्घटना के मरीजों का इलाज होगा मुश्किल”
- इलाज में लापरवाही का आरोप बनाम डॉक्टर का स्पष्टीकरण: क्या न्याय के रास्ते में आ रहे हैं नियम?
बस्ती के मेडिकल जगत से एक ऐसा मामला सामने आया है जो न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता और जटिलताओं पर तीखे सवाल भी खड़े करता है।रिपोर्ट के अनुसार, अब इलाज में लापरवाही की शिकायत करने के लिए भी आपको एक खास ‘रिश्तेदारी’ का ठप्पा होना जरूरी है। मामला एक निजी अस्पताल, ‘नवयुग मेडिकल सेंटर’ और वहां कराए गए एक मरीज के इलाज से जुड़ा है।
शिकायत का ‘दायरा’ या न्याय का ‘गला’?
हाल ही में ‘नवयुग मेडिकल सेंटर’ के खिलाफ की गई एक शिकायत के बाद यह स्पष्ट हुआ कि अस्पताल में लापरवाही के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार केवल पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन या कानूनी अभिभावक के पास ही है। यदि कोई जीजा, साला, साली या कोई अन्य संबंधी मरीज के लिए आवाज उठाता है, तो कानून की नजर में उसकी शिकायत की कोई ‘विधिक मान्यता’ नहीं है।
यह नियम कितना व्यावहारिक है? क्या अस्पताल में भर्ती व्यक्ति के लिए उसका साला या ससुर ‘पराया’ है? एक तरफ हम मानवीय संवेदनाओं की बात करते हैं, दूसरी तरफ ऐसे नियम बना दिए गए हैं जो मरीज के अपनों को भी न्याय की लड़ाई से बाहर कर देते हैं।
क्या है मामला?
अयोध्या प्रसाद पांडेय नामक व्यक्ति ने अपनी बहन के ससुर, सुरेंद्र प्रसाद मिश्र के इलाज के दौरान ‘नव्युग मेडिकल सेंटर’ पर लापरवाही का गंभीर आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री पोर्टल सहित जिलाधिकारी से अस्पताल का पंजीकरण निरस्त करने, कानूनी कार्रवाई करने और पीड़ित को मुआवजे (कंपनसेशन) दिलाने की मांग की थी।
इलाज का ब्योरा और डॉक्टर का तर्क
डॉ. नवीन कुमार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार:
- मरीज (उम्र 70 वर्ष) को 12 मई 2026 को रात 9:30 बजे गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था।
- मरीज सड़क दुर्घटना का शिकार था, उसका पैर पूरी तरह क्षतिग्रस्त था और बहुत अधिक खून बह रहा था।
- अस्पताल का दावा है कि मरीज शराब के नशे में था और उसका वजन 120 किलो से अधिक था, जो एक ‘गंभीर रोग की श्रेणी’ में आता है।
- मरीज की स्थिति की जानकारी परिजनों को पहले ही दे दी गई थी और लिखित सहमति के बाद ही इलाज शुरू हुआ था।
- डॉक्टरों का तर्क है कि यदि इस प्रकार की ‘विधिकविहीन’ शिकायतें होती रहीं, तो भविष्य में सड़क दुर्घटना में घायल मरीजों का इलाज करना डॉक्टरों के लिए चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा हो जाएगा।
आरोपों का खेल और बचाव की दीवार
इस प्रकरण में एक तरफ शिकायतकर्ता ने अस्पताल की मान्यता रद्द करने और मुआवजे की मांग की है, तो दूसरी तरफ अस्पताल प्रबंधन ने मरीज की उम्र, शराब के नशे में होने और अन्य शारीरिक स्थितियों का हवाला देकर बचाव किया है। प्रबंधन का यह तर्क भी सामने आया है कि यदि ऐसी ‘विधिकविहीन’ शिकायतें होती रहीं, तो सड़क दुर्घटना के मरीजों का इलाज करना डॉक्टरों के लिए मुश्किल हो जाएगा।
अस्पताल का चौंकाने वाला जवाब
इस शिकायत के जवाब में ‘नव्युग मेडिकल सेंटर’ के एमडी, डॉ. नवीन कुमार ने जो स्पष्टीकरण दिया, वह अब चर्चा का विषय है:
- शिकायत का अधिकार सीमित: अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि किसी भी प्राइवेट अस्पताल के खिलाफ लापरवाही की शिकायत करने का अधिकार केवल मरीज के पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन या कानूनी अभिभावक को ही है। यदि मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो यह अधिकार केवल निकट संबंधी के पास होता है। साले, ससुर, या अन्य दूर के रिश्तेदारों द्वारा की गई ऐसी शिकायतों की कोई ‘विधिक मान्यता’ नहीं है।
- शिकायतकर्ता की पात्रता पर सवाल: अस्पताल के अनुसार, सुरेंद्र प्रसाद मिश्र के मामले में शिकायत करने वाले अयोध्या प्रसाद पांडेय इस ‘विधिक श्रेणी’ में नहीं आते हैं, इसलिए उनकी शिकायत को आधारहीन माना गया है।
- साक्ष्यों की जटिल मांग: अस्पताल ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी के पास लापरवाही का कोई वीडियो साक्ष्य है, तो उसे एफएसएल (FSL) या सीएफएसएल (CFSL) से प्रमाणित कराना होगा, ताकि यह साबित हो सके कि वीडियो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है।
- आरोपों को नकारा: अस्पताल ने आरोपों को ‘सामान्य एवं स्पष्ट न होने’ वाला बताया है। डॉ. नवीन कुमार का कहना है कि इलाज के दौरान सभी चिकित्सकीय प्रोटोकॉल का पालन किया गया था।
सवाल बड़ा है
- क्या न्याय पाने के लिए रिश्ता तय करना जरूरी है?
- क्या ये नियम आम जनता को डराने के लिए बनाए गए हैं या वाकई किसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं?
अब शिकायत के लिए न केवल ‘रिश्तेदारी का प्रमाण’ देना होगा, बल्कि वीडियो साक्ष्यों के लिए एफएसएल/सीएफएसएल जैसी जटिल प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ सकता है। यह व्यवस्था मरीज को बचाने के लिए है या उन अस्पतालों को ‘सुरक्षा कवच’ देने के लिए, जिन पर लापरवाही के गंभीर आरोप हैं?यह मामला अब स्वास्थ्य व्यवस्था के उन गलियारों पर सवाल उठा रहा है जहाँ न्याय की उम्मीद के साथ मरीज और उनके परिजन जाते हैं। क्या एक ‘रिश्ते’ का सर्टिफिकेट ही यह तय करेगा कि इलाज सही हुआ या नहीं?
बस्ती की स्वास्थ्य व्यवस्था को आज इस पर आत्ममंथन की जरूरत है कि आखिर न्याय का दरवाजा इतना संकरा क्यों है?
क्या आपको लगता है कि इलाज में लापरवाही की शिकायत का अधिकार केवल करीबी परिजनों तक ही सीमित रहना चाहिए?




















