उत्तर प्रदेशलखनऊ

अधोमानक दवाओं का जाल: हिमाचल-उत्तराखंड की बदनाम कंपनियों के साथ डॉक्टरों की गुप्त डील।

नर्सिंग होम का काला सच: 5 करोड़ के निवेश से 8 साल में 16 करोड़ की अवैध कमाई। नैतिकता का पतन: मरीजों की सेहत की जगह केवल 'कमीशन' को दी जा रही प्राथमिकता।

अजीत मिश्रा (खोजी)

चिकित्सा जगत पर एक काला धब्बा: ‘इंजेक्शन’ और ‘टेबलेट’ का भयावह खेल

  • चिकित्सा जगत में कमीशन का काला सच: टेबलेट और सिरप की आड़ में मरीजों की जान से खिलवाड़
  • डॉक्टरों और दवा कंपनियों का भयावह गठबंधन: अधोमानक दवाओं से की जा रही है अरबों की कमाई
  • क्या डॉक्टर अब भगवान नहीं रहे? कमीशन के लालच में मरीजों के स्वास्थ्य से हो रहा समझौता
  • दवाओं के खेल में लुटे मरीज: 80% इंजेक्शन की जगह दी जा रही 80% टेबलेट

​चिकित्सा पेशे को समाज में ‘ईश्वर’ का दर्जा दिया जाता है, लेकिन  लेख इस पवित्र पेशे पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह रिपोर्ट स्वास्थ्य सेवा के नाम पर चल रहे उस ‘भयावह खेल’ को उजागर करती है, जहाँ मरीजों की जान से खिलवाड़ कर केवल आर्थिक लाभ कमाया जा रहा है।

मुनाफाखोरी का गणित: इंजेक्शन बनाम टेबलेट

​ जहाँ स्वास्थ्य विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार 80% इंजेक्शन और 20% टेबलेट का अनुपात होना चाहिए, वहीं मुनाफे के चक्कर में इसे बिल्कुल उलट दिया गया है। इसके पीछे का कारण स्पष्ट है—इंजेक्शन में कमीशन न के बराबर मिलता है, जबकि टेबलेट और सिरप लिखने पर डॉक्टरों को 300% तक कमीशन प्राप्त होता है। यह कमीशन-खोरी सीधे तौर पर मरीजों के स्वास्थ्य, विशेषकर उनके लीवर और किडनी पर भारी पड़ती है।

नेक्सस: अस्पताल और दवा कंपनियों का गठबंधन

​रिपोर्ट के अनुसार, कुछ नामचीन डॉक्टरों और नर्सिंग होम संचालकों ने घटिया (अधोमानक) दवा बनाने वाली कंपनियों के साथ गठजोड़ कर लिया है। हिमाचल और उत्तराखंड की ऐसी करीब 20 कंपनियों से अनुबंध कर नर्सिंग होम संचालक हर साल करोड़ों रुपये कमा रहे हैं। लेख में एक ऐसे ही नर्सिंग होम का उदाहरण दिया गया है, जिसने मात्र आठ सालों में निवेश की गई 5 करोड़ की राशि से 16 करोड़ रुपये की कमाई की है।

कमीशन का मायाजाल और अधोमानक दवाएं

खबर का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि डॉक्टर अब ‘इलाज’ के बजाय ‘कमीशन’ के आधार पर दवाएं लिख रहे हैं।

  • इंजेक्शन बनाम टेबलेट: सरकारी दिशानिर्देशों के विपरीत, जहाँ एक मरीज को ठीक करने के लिए 80% इंजेक्शन और 20% टेबलेट की जरूरत होती है, वहां डॉक्टर मरीजों को 80% टेबलेट और सिरप दे रहे हैं।
  • कमीशन का गणित: इंजेक्शन में डॉक्टरों को नाममात्र का कमीशन मिलता है, जबकि टेबलेट और सिरप लिखने पर उन्हें 300% तक का भारी-भरकम कमीशन मिलता है।
  • गुणवत्ता से समझौता: लेख के अनुसार, ये टेबलेट और सिरप अधोमानक (घटिया) श्रेणी के होते हैं। इन्हें बनाने वाली 20 से अधिक कंपनियां, जो अक्सर टिन के शेड या अत्यंत असुरक्षित स्थानों पर काम करती हैं, डॉक्टरों से अनुबंध करती हैं। यहाँ तक कि बेहोशी की दवाएं भी घटिया स्तर की लिखकर मरीजों से हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं।

 संगठित लूट का ‘बिजनेस मॉडल’

  • हिमाचल-उत्तराखंड का कनेक्शन: नामचीन नर्सिंग होम संचालक इन क्षेत्रों की बदनाम दवा कंपनियों के साथ साठ-गांठ रखते हैं। ये कंपनियां इन नर्सिंग होम को करोड़ों का वार्षिक अनुबंध देती हैं, जिसके बदले वे केवल उन्हीं का घटिया माल मरीजों को लिखते हैं।
  • संपत्ति का अंबार: लेख में एक ऐसे ही बदनाम डॉक्टर और नर्सिंग होम का उदाहरण दिया गया है, जिसने 5 करोड़ का निवेश करके 8 सालों में 16 करोड़ की कमाई की है। यह पूरी कमाई मरीजों को दी गई महंगी और अधोमानक दवाओं के कमीशन से आई है।

 नैतिकता का पूर्ण पतन

  • अमानवीय व्यवहार: मरीजों को ‘भगवान’ का दर्जा दिया जाता है, लेकिन यहाँ ये डॉक्टर मरीजों के जीवित रहने या मरने की चिंता किए बिना केवल अपने मुनाफे पर केंद्रित हैं।
  • साख का गिरना: कुछ डॉक्टर इतने बदनाम हो चुके हैं कि लोग उन्हें इज्जत की नजर से देखना पसंद नहीं करते। लेख में उल्लेख है कि लोग आपस में बात करते हुए कहते हैं कि “देखो, खून चूसने वाला डॉक्टर आ रहा है।”
  • बदनामी की सीमा: इन डॉक्टरों ने अपना जमीर और ईमान पूरी तरह बेच दिया है। वे अब मरीजों के साथ-साथ उनके परिजनों के साथ भी ‘लूटपाट’ कर रहे हैं। यहाँ तक कि मेडिकल स्टोर वालों के साथ भी मिलकर वे ‘डर्टी डील’ करने से नहीं चूकते।

यह लेख चिकित्सा पेशे के नैतिक पतन की एक डरावनी तस्वीर पेश करता है। जब चिकित्सक मरीजों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भूलकर केवल ‘जमीर और ईमान बेचकर’ पैसा कमाने में जुट जाएं, तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ऐसे गठजोड़ पर सख्त कार्रवाई और प्रशासन की कड़ी निगरानी अत्यंत आवश्यक है।यह पूरा गोरखधंधा स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा है। चाहे वह अस्पताल में भर्ती मरीजों को जबरन अधोमानक दवाएं देना हो या नर्सिंग होम के नाम पर अवैध कमाई करना, विभाग की गाइडलाइन्स पूरी तरह ताक पर रख दी गई हैं। लेख का लहजा एक चेतावनी जैसा है, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि चिकित्सा जैसे संवेदनशील पेशे में पनप रहा यह माफिया तंत्र आम लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

यह लेख चिकित्सा के नाम पर चल रहे एक बड़े माफिया तंत्र की ओर इशारा करता है, जहां मरीज केवल एक ‘मुनाफा कमाने का साधन’ बनकर रह गया है।

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