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“दिव्य देव अस्पताल या मौत का अड्डा? मासूम की जान गई और तीमारदारों को मिलीं गालियां और लाठियां!”

"मेंहदावल में निजी अस्पताल की दबंगई: डॉक्टर बनीं 'डॉन', इलाज के नाम पर परिजनों को पीटा, मंगलसूत्र भी लूटा!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

संतकबीरनगर: ‘दिव्य’ अस्पताल में मौत का तांडव, क्या डॉक्टर अब ‘यमदूत’ बन गए हैं?

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

मेंहदावल (संतकबीरनगर)। जनपद के मेंहदावल क्षेत्र में स्थित निजी अस्पतालों की मनमानी और संवेदनहीनता अब मासूमों की जान पर भारी पड़ने लगी है। मंगलवार को टड़वरिया चौराहे के पास स्थित ‘दिव्य देव अस्पताल’ में जो कुछ हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है। इलाज में लापरवाही के कारण एक नवजात की मौत ने न केवल एक परिवार का आंगन सूना कर दिया, बल्कि निजी अस्पतालों के उस खौफनाक चेहरे को भी उजागर कर दिया है जहाँ मरीज सिर्फ एक ‘रकम’ बनकर रह गया है।

लापरवाही पर सवाल किया तो मिली गालियां और मारपीट

​मरीज के परिजनों (अनुराधा पत्नी बुद्धीराम) द्वारा पुलिस को दी गई शिकायत रूह कंपा देने वाली है। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी इलाज में घोर लापरवाही बरत रहे थे। जब इस कुव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई गई, तो अस्पताल की डॉक्टर अर्चना त्रिपाठी और वहां के कर्मचारियों ने सेवा भाव को ताक पर रखकर तीमारदारों के साथ गाली-गलौज और मारपीट शुरू कर दी।

मासूम की मौत और मां के गले से ‘मंगलसूत्र’ भी गायब!

​हैरानी की बात यह है कि इस विवाद के दौरान पीड़िता के साथ न केवल मारपीट की गई, बल्कि आरोप है कि इस अफरा-तफरी में पीड़िता का सोने का मंगलसूत्र भी गायब हो गया। एक तरफ मां अपनी औलाद को खोने के गम में डूबी थी, वहीं अस्पताल प्रशासन अपनी गुंडागर्दी पर आमादा था। मारपीट के कारण पीड़िता को गंभीर अंदरूनी चोटें भी आई हैं।

प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

​घटना की शिकायत थाना मेंहदावल में दर्ज करा दी गई है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये निजी अस्पताल प्रशासन की शह पर चल रहे हैं? आखिर कब तक मेंहदावल और संतकबीरनगर की जनता इन ‘लुटेरे और संवेदनहीन’ अस्पतालों की भेंट चढ़ती रहेगी?

मुख्य बिंदु 

  • सफेद कोट के पीछे छिपी गुंडागर्दी: इलाज के बदले तीमारदारों को मारना-पीटना किस मेडिकल एथिक्स का हिस्सा है?
  • निजी अस्पतालों की मनमानी: क्या स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी इन अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ की योग्यता की जांच कभी करते हैं?
  • इंसाफ की गुहार: अनुराधा और उनके परिवार को क्या न्याय मिलेगा या रसूखदार अस्पताल प्रबंधन मामले को दबा देगा?

 

निष्कर्ष:

संतकबीरनगर के स्वास्थ्य विभाग को इस मामले में कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। यदि ‘दिव्य देव अस्पताल’ जैसे केंद्रों पर लगाम नहीं कसी गई, तो जनता का सिस्टम से भरोसा उठना तय है।

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

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