
PWD का ‘अखाड़ा’: भ्रष्टाचार की मलाई के लिए अपनों ने ही खोदी अपनों की कब्र
'संजय' सिंह 'पगार' ने 'प्रेमचंद्र' पर 'यूंही' हमला नहीं 'बोला' शीशे के घरों में रहने वाले, दूसरों पर पत्थर फेंक रहे: PWD में छिड़ी ठेकेदारों की जंग
PWD का ‘अखाड़ा’: जहाँ भ्रष्टाचार की मलाई के लिए अपनों ने ही खोदी अपनों की कब्र
- विकास के नाम पर मलाई: 25 साल का साम्राज्य और टेंडर का खेल।
- शीशे के घरों में पत्थरबाजी: जब भ्रष्टाचारी ही एक-दूसरे को ‘नंगा’ करने पर उतरे।
- अधिकारियों की चुप्पी: किसके इशारे पर हो रहा है जनता के टैक्स का बंदरबांट?
बस्ती: लोक निर्माण विभाग (PWD) का कार्यालय आजकल लोक कल्याण की योजनाओं का केंद्र कम और आपसी गैंगवार का ‘अखाड़ा’ ज्यादा बन गया है। संजय सिंह ‘पगार’ और प्रेमचंद्र के बीच चल रही तनातनी कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे भ्रष्टाचार की बदबू है, जो लंबे समय से फाइलों में दबी हुई थी।
कमीशन नहीं, अहंकार का है ‘खेल’
यह विवाद केवल ठेके या कमीशन का नहीं है, यह अहंकार की उस पराकाष्ठा का परिणाम है, जहाँ ‘मैं’ और ‘मेरा मुनाफा’ सबसे ऊपर है। संजय पगार द्वारा प्रेमचंद्र की शिकायत ‘प्रहरी ऐप’ पर करना यह साबित करता है कि विभाग के ठेकेदार अब ‘विकास’ की जगह ‘विनाश’ की राजनीति में माहिर हो गए हैं। यदि प्रेमचंद्र वास्तव में अपात्र थे, तो यह सवाल तब क्यों नहीं उठा जब वे बरसों से विभाग की मलाई चाट रहे थे? क्या शिकायत का मकसद भ्रष्टाचार मिटाना था या अपने प्रतिद्वंद्वी को रास्ते से हटाकर खुद का एकाधिकार जमाना?
शीशे के घरों में पत्थरबाजी
कहावत है कि ‘जो खुद शीशे के घर में रहते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।’ लेकिन विभाग के इन ठेकेदारों ने तो मानो पत्थर बरसाने के लिए ही आशियाने बना रखे हैं। एक ठेकेदार दूसरे के दस्तावेजों में कमी ढूंढता है, दूसरा पहले की संपत्ति पर सवाल उठाता है। इस छीछालेदर के बीच असली सवाल यह है कि आखिर ये अरबपति ठेकेदार बने कैसे?
जब लाखों के वेतन में काम करने वाले बाबू सुबह-शाम ठेकेदारों के घरों में ‘अमूल मक्खन’ लगाते दिखें, तो समझ लीजिए कि सरकारी खजाने का कितना बड़ा बंदरबांट हो रहा है। प्रेमचंद्र का 25 साल का ‘साम्राज्य’ और संजय पगार की ‘चुप्पी’, दोनों ही संदेह के घेरे में हैं। जो आज एक-दूसरे को ‘नंगा’ करने की धमकी दे रहे हैं, कल तक वे ही एक थाली में बैठकर विभाग को लूट रहे थे।
अधिकारियों की चुप्पी, मौन सहमति का प्रमाण
इस पूरे वाकये में विभाग के आला अधिकारियों की चुप्पी सबसे ज्यादा डरावनी है। क्या उन्हें नहीं पता कि उनके नाक के नीचे करोड़ों के टेंडर कैसे मैनेज किए जा रहे हैं? सच तो यह है कि यह ‘नेक्सस’ (गठजोड़) अधिकारियों के संरक्षण के बिना संभव ही नहीं है। जब तक ‘ऊपर’ तक हिस्सा पहुंचता रहता है, तब तक सब ‘दूध के धुले’ होते हैं। जिस दिन हिस्सा कम पड़ता है या किसी की महत्वकांक्षा हद से बढ़ जाती है, उस दिन ये ‘पुराने यार’ दुश्मन बन जाते हैं।
निष्कर्ष: जनता को जवाब कौन देगा?
संजय पगार और प्रेमचंद्र की यह लड़ाई विभाग के उस चेहरे को बेनकाब करती है, जिसे वर्षों से ‘दबाव और सेटिंग’ के नकाब से ढककर रखा गया था। आज जरूरत है इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की—न केवल इस टेंडर की, बल्कि पिछले एक दशक में हुए उन सभी कामों की, जिनमें इन दोनों का या इनके जैसे अन्य ठेकेदारों का हाथ रहा है।
जनता के टैक्स का पैसा विकास के लिए है, न कि ठेकेदारों और अधिकारियों के आपसी ‘ब्लैकमेलिंग’ के खेल के लिए। अगर प्रशासन अब भी नहीं चेता, तो PWD का यह दफ्तर भ्रष्टाचार का ऐसा केंद्र बन जाएगा, जहाँ ‘सत्य’ की नहीं, केवल ‘सौदा’ करने वालों की ही सुनवाई होगी।




















